Mobile radiation is denger for health

इस हद्द तक खतरनाक है मोबाइल रेडियेशन | Mobile radiation is denger for health

Mobile radiationमोबाइल रेडियेशन के दुषप्रभाव  – दोस्तों एक फिलोसिफर की ये लाइन शायद अपने सुनी ही होगी NECESSITY IS THE MOTHER OF INVENTION” मतलब जरूरत ही आविष्कार की जननि है |

यह तो आप सभी को पता है! कि टेक्नोलॉजी  का ज़माना है, हर साल नई नई टेक्नोलोजी का आविस्कार हो रहा है ताकि लाइफ  को और भी आसान और एडवांस बनाया जा सके चाहे वो किसी भी क्षेत्र मे हो, इसी वजह से आज 90% इंसान तकनीकी साधनो से घिर चुका है चाहे वो साधन किसी भी रूप मे हो |
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और  यदि आपने गौर किया होगा तो इन तकनीकी  साधनो के  बढने के साथ साथ  कई तरहा कि नई नई बीमारिया भी बढी है या फिर ऐसा कह लो कि इन चीज़ों के चलते मरीज़ो कि संख्या मे काफी इजाफा भी हुआ है | दोस्तो आपने कभी गौर किया है कि इन सब कि वजह मोबाइल से निकालने वाली रेडिएशन भी हो सकती है या फिर डॉक्टर कहेगा तभी मानोगे। दोस्तो plz  अपना कॉमन सैन्स use करे
इन्ही तकनीकी साधनों मे  से एक है मोबाइल, जोकि आज के टाइम मे एक कोमन सा नाम है, जिसका उपयोग आज के टाइम मे हर कोई कर रहा है ये एक जरूरत बन चुकी है ,मानो इसके बिना जीवन जीना संभव ही नहीं। दिन रात खाते पीते उठते बैठते बस मोबाइल।
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खैर इसकी  और डिटेल मे न जाते हुए  सीधा मुद्दे पर आते है क्यो कि आज का हमारा मुद्दा है मोबाईल टावरो से निकने वाली खतरनाक  तरंगे और इस बात से आप सब को represent करवाना कि  यह तरंगे आपकी सेहत  के लिए किस हद्द तक खतरनाक है |
तो चलिए शुरू करते है |
दोस्तो यह तो आप सभी  को पता है कि मोबाइल का हद्द से ज़्यादा इस्तेमाल किस तरहा से  लोगो कि सेहत और मानसिकता पर दुसप्रभाव डाल रहा है | 
दोस्तो मे यह नहीं  कह रहा कि आप मोबाइल चलाना बंद कर दे लेकिन  इस से निकने वाली रेडिएशन का दुसप्रभाव आपको पता  होना चाहिए और यह पूरा देखने के बाद आप खुद जान  जाएंगे कि इसका कब-कितना-और कैसे इस्तेमाल करना है |
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मोबाइल से निकालने वाली खतरनाक रेडिएशन के दुषपरिणामो से अनजान इंसान तेज़ी से खतरनाक बीमारियो का
शिकार होता जा रहा है।मोबाइल से निकलने वाले रेडिएशन से बधिरता, कमज़ोर याददाश्त, दिल की बीमारियाँ,
नपुंसकता और ब्रेन ट्यूमर जैसी अनेक बीमारियों की आशंका बनी रहती है।
रिसर्च मे पता चला
आजकल मोबाइल फोन के बिना एक मिनट भी रहना लोगों के लिए दूभर हो गया है लेकिन एक शोध अध्‍ययन से पता चला है कि लंबे समय तक मोबाइल फोन के इस्तेमाल से शरीर में बीमारियां पैदा करने वाले जैविक बदलाव हो सकते हैं।
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बता दें कि एम्स और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के अध्‍ययन में  पता चला है। एम्स में चल रहे इस अध्‍ययन में शामिल लोगों को साल में एक बार बुलाया जाता है। उनकी नए ब्लड टेस्ट की पुराने टेस्ट से तुलना की जाती है। डब्ल्यूएचओ ने पहले ही इसे कैंसर कारक बताया है।

यह भी जान ले

आप चाहे कितनी भी दूर क्यो ना बैठे हो लेकिन अपनों से बात करने के लिए आप मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर ही लेते होलेकिन क्या आप जानते हो इस मोबाइल फोन से निकलने वाली रेडिएशन आप के लिए किस हद्द तक ख़तरनाक

 

जी हा दोस्तों चाइनीज़ समेत कई नामी ब्रांड के ऐसे मोबाइल हैंडसेट कि बाजार मे भरमार है जिनसे निकलने वाला रेडिएशन  तय किये गए मानक यानी पैरामीटर से अधिक है.

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जबकि अंतर्राष्ट्रीय एवं भारतीय मानक के अनुसार मोबइल फोन का रेडिएशन लेवल 1.6 वाट /किलोग्राम से अधिक नहीं होना चाहिए. मगर कॉम्पीटिशन के इस दौर मे

तमाम टेलीकम्युनिकेशन  कंपनियां कम कीमत पर मोबाइल हैंडसेट बाजार  मे लाने के लिए इस रेडिएशन मानक की अनदेखी कर रही है..

 

 

 

कितना खतरनाक है ये जानो….

नैशनलइं  स्टिट्यूट ऑफ़ इलैक्ट्रोनिक्स एंड इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी (NIELIT) 

 के सीनियर साइंटिस्ट निशांत त्रिपाठी के मुताबिक मानक से अधिक रेडिएशन वाले इन मोबाइल हैंडसेट से सुन ने कि क्षमता कम होने से लेकर अवसाद समेत कई घातक बीमारियां होने ही शंका रहती है.

इंडिआज़ नैशनल स्पेसिफिक ऑब्ज़र्वेशन रेट लिमिट (INSARL) के अनुसार भी मोबाइल का मानक अधिकतम 1.6 वाट प्रति किलोग्राम तक ही होना चाहिए.

 

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अपने मोबाइल का रेडिएशन जांचने के लिए *#07# dayalकरें. यह नंबर dayal करते ही  मोबाइल फोन पर रेडिएशन वैल्यू आजाएगी .



हालांकि भारत सरकार ने इसके लिए एक मानक भी तय कर रखा है जिसमे ज्यादा रेडिएशन देने वाले मोबाइल फोन्स की बिक्री पर रोक है।
बता दें कि इंडियाज नेशनल स्पेसिफिक एब्जॉर्बशन रेट लिमिट (आईएनएसएआरएल) के अनुसार, मोबाइल के रेडिएशन का मानक अधिकतम 1.6 वॉट प्रति किलोग्राम से अधिक नहीं होना चाहिए।
जबकि चीन समेत कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां इसकी परवाह किए बिना धड़ाधड़ अपने स्मार्टफोन भारतीय बाजार में उतार रही हैं।
इस शोध मे पता चला
वर्ष 2013 से दिल्ली-एनसीआर के 4500 लोगों पर शोध किया जा रहा है। अध्‍ययन के शुरुआती नतीजे बताते हैं कि मोबाइल फोन के ज्यादा इस्तेमाल से – कम सुनने की समस्या, प्रजनन क्षमता और ध्यान में कमी के साथ हाइपरएक्टिव जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
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अध्‍ययन के फाइनल रिजल्ट तक पहुंचने के लिए अभी तीन-चार साल और लगेंगे। अध्‍ययन में शामिल डॉक्टर कहते हैं कि यह तय है कि मोबाइल रेडिएशन का बुरा असर पड़ता है, इसलिए जहां तक संभव हो इसका कम से कम इस्तेमाल करें।
इस हद्द तक है खतरनाक
मोबाइल रेडिएशन पर कई रिसर्च पेपर तैयार कर चुके आईआईटी बॉम्बे में इलेक्ट्रिकल इंजिनियर प्रो. गिरीश कुमार का कहना है कि मोबाइल रेडिएशन से तमाम दिक्कतें हो सकती हैं, जिनमें प्रमुख हैं
सिरदर्द, सिर में झनझनाहट, लगातार थकान महसूस करना, चक्कर आना, डिप्रेशन, नींद न आना, आंखों में ड्राइनेस, काम में ध्यान न लगना, कानों का बजना, सुनने में कमी, याददाश्त में कमी, पाचन में गड़बड़ी, अनियमित धड़कन, जोड़ों में दर्द आदि।
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इस पर की गई स्टडी कहती है कि मोबाइल रेडिएशन से लंबे समय के बाद प्रजनन क्षमता में कमी, कैंसर, ब्रेन ट्यूमर और मिस-कैरेज की आशंका भी हो सकती है।
दरअसल, हमारे शरीर में 70 फीसदी पानी है। दिमाग में भी 90 फीसदी तक पानी होता है। यह पानी धीरे-धीरे बॉडी मे रेडिएशन को अब्जॉर्ब करता है और आगे जाकर सेहत के लिए काफी नुकसानदेह होता है। 

यहां तक कि बीते साल आई डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक मोबाइल से कैंसर तक होने की आशंका जताई गई है। इंटरफोन स्टडी में कहा गया कि हर दिन आधे घंटे या उससे ज्यादा मोबाइल का इस्तेमाल करने पर 8-10 साल में ब्रेन ट्यूमर की आशंका 200-400 फीसदी बढ़ जाती है।
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क्या होता है मोबाइल रेडिएशन
मोबाइल फोन रेडिएशन को गैर-आयनीकरण के रूप में वर्गीकृत किया गया है। गैर- आयनीकरण रेडिएशन विभिन्न प्रकार के विद्युत चुम्बकीय रेडिएशन को दर्शाता है।
अगर इसे आसान शब्दों में कहें, इसका अर्थ है कि गैर- आयनीकरण रेडिएशन द्वारा ऊर्जा को किसी अन्य रूप में छोड़ा जाता है। यह अणुओं को आयनित (nonIonized) नहीं करता है जो अधिक हानिकारक रेडिएशन प्रभाव पैदा कर सकता है।
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गैर- आयनीकरण (nonIonized) रेडिएशन के अन्य रूपों में माइक्रोवेव, रेडियो तरंगें और दृश्यमान (Visible) प्रकाश (लाइट्स) शामिल हैं। हम इस तरह के या इस तरह से होने वाले रेडिएशन को भी अवॉयड नहीं कर सकते हैं, इसके अलावा हम मोबाइल रेडिएशन को भी किसी भी रूप में अवॉयड नहीं कर सकते हैं।
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कितनी प्रकार का होता है रेडिएशन ?
माइक्रोवेव रेडिएशन उन इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्स के कारण होता है, जिनकी फ्रीक्वेंसी 1000 से 3000 मेगाहर्ट्ज होती है। माइक्रोवेव अवन, एसी, वायरलेस कंप्यूटर, कॉर्डलेस फोन और दूसरे वायरलेस डिवाइस भी रेडिएशन पैदा करते हैं। लेकिन लगातार बढ़ते इस्तेमाल, शरीर से नजदीकी और बढते मोबाइल user की वजह से मोबाइल रेडिएशन सबसे खतरनाक साबित हो सकता है। मोबाइल 

रेडिएशन दो तरह से होता है, मोबाइल टावर और मोबाइल फोन से।
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रेडिएशन से किसे ज्यादा नुकसान होता है?

मैक्स हेल्थकेयर में कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. पुनीत अग्रवालके मुताबिक मोबाइल रेडिएशन सभी के लिए नुकसानदेह है लेकिन बच्चे, महिलाएं, बुजुर्गों और मरीजों को इससे ज्यादा नुकसान हो सकता है।

 

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अमेरिका के फूड एंड ड्रग्स ऐडमिनिस्ट्रेशन का कहना है कि बच्चों और किशोरों को मोबाइल पर ज्यादा वक्त नहीं बिताना चाहिए और स्पीकर फोन या हैंडसेट का इस्तेमाल करना चाहिए, ताकि सिर और मोबाइल के बीच दूरी बनी रहे। बच्चों और प्रेगनेंट महिलाओं को भी मोबाइल फोन के ज्यादा यूज से बचना चाहिए।


गर्भवती महिलाए रहे सावधान:-Mobile radiation
यह रेडिएशन नवजात शिशु के डीएनए तक को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा इससे शिशु को कैंसर तक का खतरा भी बढ़ जाता है।
मोबाइल फोन से निकलने वाले रेडिएशन इतने मजबूत होते हैं कि यह आसानी से आनुवंशिक जानकारी में परिवर्तन कर सकते हैं। इससे आंख का कैंसरथायराइडमेलेनोमा ल्यूकेमिया और स्तन कैंसर जैसी बीमारियां हो सकती हैं।
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गर्भावस्था के दौरान महिलाओं द्वारा मोबाइल फोन का प्रयोग गर्भ पल रहे  शि‍शु के स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकता है।
जन्म से पहले शि‍शु पर नकारात्मक प्रभाव उसकी दिमागी क्षमता को प्रभावित करने के साथ-साथ स्वभावगत परेशानियां भी पैदा कर सकता है। यह दुष्प्रभाव धूम्रपान या अल्कोहल के परिणामस्वरूप होने वाले नुकसान के बराबर हैं।
मोबाइल टावर या फोन, किससे नुकसान ज्यादा?
प्रो. गिरीश कुमार के मुताबिक मोबाइल फोन हमारे ज्यादा करीब होता है, इसलिए उससे नुकसान ज्यादा होना चाहिए लेकिन ज्यादा परेशानी टावर से होती है क्योंकि मोबाइल का इस्तेमाल हम लगातार नहीं करते, जब तक use करेंगे तब तक ही रेडिएशन हमारे आसपास रहती है , 
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जबकि टावर लगातार चौबीसों घंटे रेडिएशन फैलाते हैं। मोबाइल पर अगर हम घंटा भर बात करते हैं तो उससे निकलने वाली रेडिएशन से हमारे शरीर को जो नुकसान होता है उस नुकसान की भरपाई हमारा शरीर 23 घंटे मे कर लेता हैंजबकि टावर के पास रहनेवाले लोग,
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जो की इस बात से अंजान और मजबूरी की वजह से उस जगहे पर रेह रहे है उससे लगातार निकलने वाली तरंगों की जद में रहते हैं। तो वो तो सीधा सीधा मौत के मुह मे बैठे हुए है. 

अगर घर के समाने टावर लगा है तो उसमें रहनेवाले लोगों को 2-3 साल के अंदर सेहत से जुड़ी समस्याएं शुरू हो सकती हैं।

मुंबई की ऊसा किरण बिल्डिंग में कैंसर के कई मामले सामने आने को मोबाइल टावर रेडिएशन से जोड़कर देखा जा रहा है। फिल्म ऐक्ट्रेस जूही चावला ने सिरदर्द और सेहत से जुड़ी दूसरी समस्याएं होने पर अपने घर के आसपास से 9 मोबाइल टावरों को हटवाया।
मोबाइल टावर के किस एरिया में नुकसान सबसे ज्यादा?
मोबाइल टावर के 300 मीटर एरिया में सबसे ज्यादा रेडिएशन होता है। ऐंटेना के सामनेवाले हिस्से में सबसे ज्यादा तरंगें निकलती हैं। जाहिर है, सामने की ओर ही नुकसान भी ज्यादा होता है, पीछे और
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नीचे के मुकाबले। मोबाइल टावर से होनेवाले नुकसान में यह बात भी अहमियत रखती है कि घर टावर पर लगे ऐंटेना के सामने है या पीछे। इसी तरह दूरी भी बहुत अहम है। टावर के एक मीटर के एरिया में 100 गुना ज्यादा रेडिएशन होता है। टावर पर जितने ज्यादा ऐंटेना लगे होंगे, रेडिएशन भी उतना ज्यादा होगा।
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ऐसे बचें रेडिएशन के बुरे प्रभाव से

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