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Karwa chauth par nibandh | करवा चौथ पौराणिक कथा

Karwa chauth par nibandh,करवा चौथ पर निबंध  – नमस्कार दोस्तों स्वागत है आज आपका करवा चौथ के इस निबंध मे. आज हम इस खूबसूरत निबंध के माध्यम से जानेंगे की करवा चौथ क्या है क्यों मनाया जाता है? करवा चौथ व्रत कैसे रखा जाता इसकी महत्ता क्या है?

 

हर वर्ष की इस वर्ष भी सुहागिन स्त्रियों के द्वारा करवा चौथ पूरी आस्था श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा.

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करवा चौथ पर निबंध

हर वर्ष कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाने वाला करवा चौथ का महा पर्व हिन्दुओ मे बहुत खास महत्त्व रखता है.

 

चलिए जानते है करवा चौथ कब से शुरू हुआ इसके पीछे की पौराणिक कथाए.

 

करवा का अर्थ मिट्टी का बर्तन होता है. चौथ का शाब्दिक अर्थ चतुर्थी है.

 

करवा चौथ भारत का एक धार्मिक पर्व है जिसमे सुहागिन स्त्रियां अपने पति की लम्बी आयु एवं उनके जीवन से सभी तरह के दुख कष्ट निवारण हेतु चन्द्रमा निकलने तक निराजली व्रत रख कर संध्या के पूरी आस्था श्रद्धा के साथ विधि विधान से माता करवा करवा, भगवान गणेश, भगवान शिव, भगवान कार्तिकेय, और माँ गौरी की पूजा की जाती है.

 

पूजा सम्पूर्ण करने के बाद चन्द्रमा निकलने पर चन्द्रमा को अर्घ दिया जाता है. फिर पति के हाथों जल ग्रहण कर व्रत खोला जाता है. फिर वर्तधारी वैवाहिक स्त्रियों द्वारा अपने सास ससुर के पैर छू कर उनका आशीर्वाद लिया जाता है.

 

निराजली व्रत का अर्थ होता है बिना अन्न का एक दाना खाए और बिना पानी का एक घूट पिए व्रत का पालन करना. यह व्रत बहुत कठोर होता है.

 

लेकिन मान्यता अनुसार जो कोई भी इस व्रत को श्रद्धा अनुसार पूरा कर लेना है तो करवा माता उसकी हर मनोकामना अवश्य पूर्ण करती है.

 

करवा चौथ क्यों मनाया जाता है?

भारत मे करवा चौथ का चलन बहुत पुराने समय से चला आरहा है.

 

मान्यता है की पूरी आस्था श्रद्धा से करवा चौथ माता के व्रत का पालन करने वाली सुहागिन महिलाओं पर करवा माता और माँ गौरी की विशेष कृपा बनी रहती है. इसलिए सुहागिन स्त्रियां इस पर्व को बड़ी ही श्रद्धा भावना से मनाती है. इसलिए करवा का यह महान पर्व सुहागिन स्त्रियों द्वारा मनाया जाता है.

 

भारत के अलग अलग राज्यों मे करवा चौथ मनाने के तरीको मे थोड़ा बहुत अंतर रहता है. हर कहीं शुरू से चली आरही अपनी परम्परा अनुसार करवा का व्रत रख कर पूजा पाठ करते है.

 

करवा चौथ पौराणिक कथा 

ऐसी मान्यता है की यह परम्परा देवताओं के समय से चली आरही है. कहा जाता है की देवताओं और दानवो के युद्ध के दौरान देवताओं को विजई बनाने के लिए ब्रम्हा जी ने देवताओं की पत्नियों व्रत रखने का सुझाव दिया था.

 

ब्रम्हा जी के इस सुझाव को स्वीकार करते हुए सभी देवियों ने निराहार निर्जला व्रत रखा. नतीजा यह रहा की सभीवदेव विजयी हुए.

 

और इसके बाद भी सभी ने अपने पतियों (देवताओं) के हाथों फ़लाहर करके अपने अपने व्रत को खोला.

यह समय कृष पक्ष का समय था.

मान्यता है तभी से पतियों की लम्बी उम्र के लिए सुहागिन स्त्रियां द्वारा करवा चौथ का व्रत रखने की परम्परा चली आरही है.

 

करवा चौथ के पीछे की एक पौराणिक कथा यह भी है की शिव जी को प्राप्त करने के लिए देवी पार्वती ने भी इस व्रत को किया था. महाभारत कल मे भी इस व्रत का जिक्र मिलता है.

 

महाभारत कल मे द्रोपदी ने पांडवो के लिए और गांधारी ने धृतराष्ट के लिए यह व्रत किया था.

 

बस तभी से इस व्रत की प्रथा चली आरही है.

 

करवा चौथ व्रत कथा 

करवा चौथ की कुछ प्रचलित कथाएं है जिनमे से एक कथा है माता करवा की.

 

देवी करवा अपने पति के साथ तुंगभद्रा नदी के पास रहती थीं।

 

 एक दिन करवा के पति नदी में स्नान करने गए तो एक मगरमच्छ ने उनका पैर पकड़ लिया और नदी में खींचने लगा।

 

दर्दनाक कष्ट और मृत्यु करीब देखकर करवा के पति चिल्लाए और करवा को पुकारने लगे।

 

करवा दौड़कर नदी के पास पहुंचीं और पति को मृत्यु के मुंह में ले जाते मगर को देखा।

 

करवा ने तुरंत एक कच्चा धागा लेकर सिद्ध मंत्रो के जाप से मगरमच्छ के आत्मिक शरीर को एक पेड़ से बांध दिया।जिस वजह से मगर मच्छ अपने शरीर से अब कोई शेष क्रिया नहीं कर सकता था. यानी अपने स्थूल शरीर को हिला भी नहीं सकता था.

किन्तु अभी भी करवा के पति का पैर मगरमच्छ के जबड़ो मे फंस कर पूरी तरह लहू लुहान था अब उसमे इतना समर्थ नहीं था की वो अपने पैरो को निकाल सके. पति के प्राण संकट में फंसे थे।

 

करवा ने यमराज को पुकारा और अपने पति को जीवनदान देने और मगरमच्छ को मृत्युदंड देने के लिए कहा। यमराज ने कहा मैं ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि अभी मगरमच्छ की आयु शेष है और तुम्हारे पति की आयु पूरी हो चुकी है।

 

क्रोधित होकर करवा ने यमराज से कहा, अगर आपने ऐसा नहीं किया तो मैं आपको शाप दे दूंगी। अतः मुझे मिले वरदान के अनुसार मैंने आपका आवाहन किया है तो आप मेरे पति के प्राण नहीं लेजा सकते अतः आवाहन स्वरूप आप मै आपसे अपने पति का जीवन दान मांगती हूं जिसे आपको हर हाल मे पूरा करना होगा.

 

यदि ऐसा नहीं करते तो वरदान झूठा होगा.

 

अब यमराज अज़ीब धर्म संकट मे फंस गए कुछ देर विचार पश्चात् यमराज को विवश हो कर मगरमच्छ के प्राण लेकर जाने पड़े.

 

 और करवा के पति को जीवनदान दिया। इसलिए करवाचौथ के व्रत में सुहागन स्त्रियां करवा माता से प्रार्थना करती हैं कि हे करवा माता जैसे आपने अपने पति को मृत्यु के मुंह से वापस निकाल लिया वैसे ही मेरे सुहाग की भी रक्षा करना।

 

करवा माता की तरह सावित्री ने भी कच्चे धागे से अपने पति को वट वृक्ष के नीचे लपेट कर रख था। कच्चे धागे में लिपटा प्रेम और विश्वास की शक्ति के यमराज भी विवश थे.

 

फ्लस्वरूप यमराज सावित्री के पति के प्राण अपने साथ लेकर नहीं जा सके। सावित्री के पति के प्राण को यमराज को लौटाना पड़ा और सावित्री को वरदान देना पड़ा कि उनका सुहाग हमेशा बना रहेगा और लंबे समय तक दोनों साथ रहेंगे।

 

करवा व्रत की एक और प्रसिद्ध कथा 

 

करवा चौथ व्रत का महत्व.

सुहागिन महिलाओं के जीवन मे करवा चौथ का यह पर्व एवं व्रत बहुत विशेष महत्त्व रखता है .

  1. मान्यता है की इस दिन सुहागिन स्त्रियां ज़ब व्रत रख कर पूरी आस्था के साथ करवा माता की विधि विधान से कथा सुनती है और पूजा करती है तो इससे माता करवा की उन पर विशेष कृपा होती है. जीवन के दुख कस्ट कट जाते है.
  2. पति की आयु लम्बी होती है और पति के जीवन मे आने वाली घोर विपदा टल जाती है.
  3. पति पत्नी का रिश्ता अच्छा बना रहता है वैवाहिक जीवन मे खुश हाली आती है और सब दुख कस्ट खत्म होने लगते है.
  4. स्त्रियों के मन की मनोकामनाए पूरी होती है.
  5. ग्रहस्त जीवन अच्छा होता है घर से क्लेश दूर होकर प्रेम व्यवहार बढ़ने लगता है.

उम्मीद करता करवा चौथ की यह तमाम जानकारी आपको अच्छी लगी होगी.

 

हम अपने blog पर त्योहारों से जुड़ी ऐसी update लाते रहते है हमारे blog gyandarshan मे बने रहे.

 

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