भारत के बोधिधर्मन bodhidharma मार्शल आर्ट के जन्म दाता

बोधिधर्मन bodhidharma – भारत मे युद्ध और युद्ध कला सतयुग से कालयुग तक चलती आरही हैं. भारत  कई मामलों मे विश्व गुरु रहा हैं चाहे वो युद्ध के क्षेत्र मे हो, या चिकित्सा, संगीत, विज्ञान के क्षेत्र मे | रामायण और महाभारत को देखते हुए भारत पूरे विश्व  मे अपने अद्भुतअस्त्र शस्त्र और कुशल युद्ध विद्या के लिए विख्यात रहा है |

अपनी आत्म रक्षा के लिए ऐसी ही एक महान विद्या भारत के ही एक महान पुरुष ने बनाई जिनका नाम है बोधिधर्मन (bodhidharma).यह वही महान विद्या हैं जिसे हम मार्शल आर्ट के नाम से जानते हैं. 

जी हाँ वही मार्शल आर्ट जिसे सुनते ही मन मे चीन जापान का देश, मार्शल आर्ट के लिए जाना जाने वाला चीन का मशहूर शाओलिन मंदिर वहां के लोग और मार्शल आर्ट वाली फिल्मे दिमाग़ मे घूमने लगती हैं.

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और शरीर मे एल जोश भर जाता हैं फिर अंदर से इच्छा होती हैं की काश मुझे भी यह विद्या आजाए.चीन के शौलीन मंदिर मे दूर  दूर से लोग मार्शल आर्ट सीखने आते है |

 

लेकिन यह विद्या सीखनी कोई मज़ाक़ नहीं. बस यह समझ लो की मार्शल आर्ट सीखना किसी कठोर तपस्या जैसा हैं जिसमे बहुत कठोर नयमों का पालन करना पड़ता हैं. बहुत कठोर परिश्रम.

इसीलिए बहुत कम लोग ही मार्शल आर्ट की विद्या सीख पाते हैं.

 

भारत के बोधिधर्मन  bodhidharma मार्शल आर्ट के जन्म दाता

bodhidharma

तो चलिये जानते है मार्शल आर्ट यानि कुङ्ग्फ़ु की उत्पत्ति का इतिहास| साथ मे यह जानेंगे की भारत की यह अद्भुत कला आखिर चीन कैसे पहुँच गई | 

 

दोस्तों ! जब इतिहास के पन्नो को खंगाला गया तो मार्शल आर्ट की उत्पत्ति की सच्चाई निकल कए सामने आई | मार्शल आर्ट (कुंग फूँ) की इस विद्या को भारतीय इतिहास मे कलारीपयट्टू के नाम से जाना जाता है और इस बात को बहुत कम लोग ही जानते है | 

इस पर गहन अदध्ययन के बाद यह पता चला की इस विद्या का  जन्म दाता भारत का ही एक महान इंसान था जिनका नाम था बोधिधर्मन (bodhidharma) | बोधिधर्मन (bodhidharma) एक महान बौद्ध भिक्षु  थे |

 

बोधिधर्मन (bodhidharma) का जन्म 500 ईस्वी के आसपास दक्षिण भारत के पल्लव राज्य के कांचीपुरम के राज परिवार में हुआ था। बोधिधर्मन (bodhidharma) कांचीपुरम के राजा सुगंध के तीसरे पुत्र थे।

उस दौर मे पूरे  दक्षिण भारत मे बौद्ध धर्म का बहुत प्रचार प्रसार था जिसके चलते वहाँ  के लोग इस धर्म के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित और निष्ठावान थे | बोधिधर्मन (bodhidharma) जब कुछ बड़े हुए तो उनको बौद्ध धर्म का ज्ञान दिया जाना शुरू किया गया जिसके चलते वह बौद्ध धर्म से बहुत प्रभावित हुए अतः आगे चलकर वह बहुत महान बौद्ध भिक्षु भी बने |
छोटी आयु में ही उन्होंने राज्य छोड़ दिया और भिक्षुक बन गए। एक बौद्ध बिक्षुक होने के नाते उनका मन बहुत ही शांत था जिसके चलते उनका ध्यान मे लगाव स्वाभाविक ही था | ध्यान  के प्रति अधिक लगाव होने वजह से उन्होने अपने मन को बहुत अच्छे से एकाग्र करना सीख लिया था |
बोधिधर्मन (bodhidharma) कुछ भी सीखने मे बहुत कुशल इंसान थे जिसके चलते उन्होने कम समय मे ही ,आयुर्वेद का ज्ञान ,चिकत्सा और ध्यान जैसी विद्या मे पारंगत हासिल कर ली थी |
अपनी कुशल ध्यान विद्या के चलते 22 साल की उम्र तक आते आते  उन्होंने संबोधि (मोक्ष की पहली अवस्था) को प्राप्त किया। इस बीच उन्होने भारत के कुछ ऐसे इलाकों का भ्रमण किया जहां उन्होने कमजोर लोगो पर बहुत जुल्म होते हुए देखें |
यही से बोधिधर्मन (bodhidharma) ने स्वयं की रक्षा के लिए एक विद्या को जन्म दिया जिसे सीख कर और उस विद्या का  उपयोग कर कोई भी इंसान विकट परिस्थितियों मे न सिर्फ अपनी बल्कि दूसरे कमजोर लोगो की सुरक्षा भी कर सकेगा |
इसी को ध्यान मे रखते हुए बोधिधर्मन  जी ने पुराणों मे बहुत सी युद्ध विद्याओं का अध्ययन करते हुए यह जाना की एक विद्या एसी है जिसका इस्तेमाल कर  इंसान कमजोर इंसान भी  बिना  किसी शस्त्र का इस्तेमाल किए सामने वाले को प्रास्त कर सकता है |
इस विद्या का नाम था कलारीपयट्टू था जिसका  सर्वप्रथम  उपयोग  महारिशी अगस्त्य ने किया था तब यह विद्या इतनी विकसित और प्रभावशाली नहीं  थी यह पहली एसी  विद्या थी जिसमे बिना किसी शस्त्र का उपयोग किए अंदरूनी शक्ति या कुंडलिनी शक्ति के माध्यम से शरीर को ही एक अस्त्र के रूप मे उपयोग कर स्वयं की रक्षा की जा सकती थी |
बाद मे दूसरी बार भगवान परशुराम जी ने इस विद्या को शस्त्र के साथ उपयोग किया था |जिसे शस्त्र युक्त कलारिप्पयतु के नाम से जाना जाता है |
इस प्रकार बोधिधर्मन (bodhidharma) ने जाना की  समय के साथ साथ चली आरही परंपरागित तौर पर इस विद्या मे बहुत बदलाव किए गए | इसके बाद बोधिधर्मन (bodhidharma) जी ने महाभारत काल की उस विद्या पर गहन अदध्ययन किया जिस विद्या का इस्तेमाल कर श्री कृष्ण जी ने  चाणूर और मुष्टिक जैसे मल्लों का वध किया था तब उनकी उम्र 16 वर्ष की थी।
मथुरा में दुष्ट रजक के सिर को हथेली के प्रहार से काट दिया था। जनश्रुतियों के अनुसार श्रीकृष्ण ने मार्शल आर्ट का विकास ब्रज क्षेत्र के वनों में किया था। इस विद्या को भी  कालारिपयट्टू विद्या कहा जाता है | जिसमे श्री कृष्ण जी बिना किसी अस्त्र शस्त्र की मदद से एसा कर पाए थे |

 

अब बोधिधर्मन (bodhidharma) जी ने इस विद्या को सीख कर इसमे और भी कई बदलाव कर इसे एक नया आयाम दिया | बोधिधर्मन जी (bodhidharma) की इस विद्या मे खुद को मानसिक और शारीरक 

 

तौर पर बराबर मजबूत बनाया जाता है | जिसमे योग विद्या और योग आसन का बहुत अधिक महत्त्व होता है | बोधिधर्मन (bodhidharma) शुरू से ही योग विद्या मे पारंगत थे जिसके चलते उनको कालारिपयट्टू विद्या सीखने और इसको 

 

एक नया आयाम देने देने मे अधिक समय नहीं लगा | इसी बीच बोधिधर्मन (bodhidharma) ने  अपनी कुशल ध्यान विद्या के चलते सम्मोहन विद्या और पंच तत्वो पर काबू करने की विद्या पर भी पारंगत हासिल कर ली | बोधिधर्मन अब पंच तत्वों पर काफी हद तक काबू पा सकते थे |

 

एक साधारण इंसान के लिए बोधिधर्मन (bodhidharma) की इस कालारिपयट्टू विद्या को सीखना इतना आसान नहीं था  जितना बोधिधर्मन (bodhidharma) के लिए था क्योकि वह पहले से कई विद्याओं मे नूपुण थे | जिस वजह से उन्हे इस विद्या मे पारंगत हासिल करने मे अधिक समय नहीं लगा |

 

इतिहास मे एसे कई प्रमाण मिलते  है की बोधिधर्मन (bodhidharma) को   कालारिपयट्टू विद्या को  सीखने और इसको नया आयाम देने मे  उन्हे करीबन 1095 दिनों का वक्त यानी 3 साल लग गए  थे  | जिसमे उन्होने न सिर्फ बोधिधर्मन (bodhidharma)की  विद्या मे पारंगत पाई बल्कि इसके साथ साथ सम्मोहन और पंच तत्वों पर काबू करने की भी विद्या सीखी|

 

कैसे बन गई यह विद्या मार्शल आर्ट ?और कैसे जा कर बस गई यह अद्भुत विद्या चीन मे ?

 

मार्शल आर्ट जैसी अद्भुत विद्या का चीन मे जाकर बस जाने की कहानी शुरू होती है दक्षिण भारत की राज माता के आदेश से | जब बोधिधर्मन 24 वर्ष के हुए तो उन्हे राज माता की तरफ से आदेश मिला की आब आप बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार करते हुए नेपाल से चीन की तरफ जाए |

तब बोधिधर्मन (bodhidharma) बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार करते हुए नेपाल के रास्ते से चीन सीमा तक पहुचे | चीन पहुँचने मे उन्हे 3 साल का वक्त लगा था और 3 साल के  इसी लंबे समय के अंतराल मे बोधिधर्मन (bodhidharma) ने मार्शल आर्ट जैसी अद्भुत कला को जन्म दिया था |

 

बोधिधर्मन (bodhidharma) सबसे पहले चीन देश के नानयिन (नान-किंग) गांव मे पहुंचे।बोधिधर्मन चीन यात्रा 

 

नाम की एक किताब  मे यह  पुख्ता जानकारी सामने आई है की बोधिधर्मन (bodhidharma) के चीन आने से कुछ समय पहले चीन के ज्योतिशयों  ने यह भाविस्यवाणी करते हुए गाँव के लोगो को यह बताया की कुछ ही दिनों बाद इस गाँव मे बहुत बड़ा संकट आने वाला है | अब संकट किस रूप मे और किस प्रकार का आने वाला है इसका अंदाजा ज्योतिशयों को नहीं था | 

जिसके चलते  बोधिधर्मन (bodhidharma) जब चीन के नानियाँ गाँव मे पहुंचे तो ज्योतिशयों ने उन्हे ही इस गाँव का संकट समझ लिया और उन्हे गाँव से बाहर जंगल मे भेज दिया गया | 

जिस वजह से बोधिधर्मन को कई दिनों तक जंगल मे रहना पड़ा |

लेकिन असल रूप मे संकट बोधिधर्मन (bodhidharma) नहीं बल्कि कुछ और है  इस बात का अंदाजा ज्योतिशयों और गाँव के लोगो को तब हुआ -जब संकट एक महामारी के रूप मे पूरे गाँव को अपनी चपेट मे लेने लगा था |

शुरू मे जब गाँव के लोग इस बीमारी से ग्रसित होने लगे एक के बाद एक आदमी को यह बीमारी अपनी आगोश मे लेते जा रही थी जिसके चलते गाँव वालो के लिए तुरंत इस बीमारी से बच पाना और इसका उचित उपचार पता लगा पाना  नामुमकिन|

 

गाँव के लोगो ने देखा की यह बीमारी लोगो मे फैलती जा रही है एसे मे यह बीमारी पूरे गाँव मे फैलने से रोने के लिए बीमारी से पीड़ित लोगो को दूर गाँव से बाहर जंगल मे छोड़ा जाने लगा |

 

जंगल मे मौजूद बोधिधर्मन (bodhidharma) ने जब लोगो की यह हालत देखि तो उन्होने तुरंत जंगल से जरूरी जड़ी बूटियों को ढूंढ कर उन लोगो का उपचार शुरू किया | क्यो की बोधिधर्मन को आयुर्वेद का भी  बहुत अच्छा  ज्ञान था |

कुछ दिन बाद वह फिर से स्वस्थ हो गए | ठीक हुए लोगो ने बोधिधर्मन (bodhidharma) को गाँव चलने के लिए बड़ी ही निम्रता से निवेदन किया फिर वह लोग जब  बोधिधर्मन (bodhidharma) को अपने गाँव लेकर गए  तब गाँव के लोग  बीमारी से पीड़ित लोगो को बोधिधर्मन

के साथ इस प्रकार एक दम स्वस्थ खड़ा देख हकके बकके रह गए | तब स्वस्थ हुए लोगो ने गाँव वालो को  सब कुछ बताया |

 

उनकी बाते सुन गाँव के लोग और ज्योतिषी बहुत शर्मिंदा हुए और सब ने बोधिधर्मन से माफी मांगते हुए उनका गाँव मे सम्मान सहित स्वागत किया |

बोधिधर्मन (bodhidharma) कुछ दिन उसी गाँव मे रह कर बौद्ध धर्म के प्रचार के साथ साथ गाँव के लोगो को बहुत सी जड़ी-बूटियों का ज्ञान  भी दिया |

 

कुछ समय बाद हैवानों, लुटेरों की एक टोली ने गांव पर हमला कर दिया और वे क्रूर लोगों को मारने लगे। चारों और कत्लेआम मच गया। 

यह देख  बोधिधर्मन (bodhidharma)ने गाँव के लोगो को उन दुष्टों से बचाने के लिए अपनी कलारिप्पयतु  विद्या यानी मार्शल आर्ट का उपयोग किया | अपनी इस अद्भुत कलारिप्पयतु विद्या का उपयोग करते हुए बोधिधर्मन (bodhidharma) ने बिना किसि शस्त्र की मदद से  सभी दुष्टों को मार गिराया |

 

बहुत से दुस्ट लोग बोधिधर्मन (bodhidharma) के लड़ने की इस कला को देख कर डर गए और अपने हथियार डाल दिये कुछ दुष्ट लोग तो वहाँ से भाग निकले | इस प्रकार बोधिधर्मन (bodhidharma) ने इस विद्या का उपयोग करते हुए पूरे गाँव को बचाया |

गाँव के  लोगो ने बोधिधर्मन (bodhidharma) को जब बिना किसि शस्त्र से लड़ने की इस अद्भुत कला को देखा तो वह तो दंग रह गए |

गाँव के लोग बहुत खुश हो गए की इतनी सारी विद्याओं को जानने वाला इंसान हामरे बीच है |

इसके बाद बोधिधर्मन (bodhidharma) ने अपनी इस कलारिप्पयतु  विद्या को पूरे गाँव के लोगो को सिखाई | गाँव के लोगो ने लड़ने इस कला को नाम दिया कुंग फू | 

धीरे धीरे यह विद्या पूरे चीन मे विख्यात हो गई | आगे चल कर चीन मे  इस विद्या को सीखने का एक केंद्र बनाया गया जिसका नाम था शौलीन टेंपल | वही से इस कला को मार्शल आर्ट कहा जाने लगा |

 

 

श्रीकृष्ण ने ही कलारिपट्टू की नींव रखी, जो बाद में बोधिधर्मन से होते हुए आधुनिक मार्शल आर्ट में विकसित हुई। बोधिधर्मन के कारण ही यह विद्या चीन, जापान आदि बौद्ध राष्ट्रों में खूब फली-फूली। आज भी यह विद्या केरल और कर्नाटक में प्रचलित है। 

समय के साथ साथ इस विद्या को इस अद्भुत कला को आत्मिक और शारीरिक बल की सहायता से  और भी निखारा गया |

 

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