amitabh bachchan strugle success inspirational story

 

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सात में से एक हिन्दुस्तानी amitabh bachchan

अजिताभ ने अमिताभ amitabh bachchan की कुछ तस्वीरें निकाली थीं, उन्हें ख्वाजा अहमद अब्बास के पास भिजवा दिया गया था। उन दिनों वे सात हिन्दुस्तानी फिल्म बनाने की तैयारी कर रहे थे। इन सात में एक मुस्लिम युवक का रोल अमिताभ को प्राप्त हुआ। इस चुनाव के वक्त अब्बास साहब को यह नहीं मालूम था कि अमिताभ amitabh bachchan  कवि बच्चन के साहबजादे हैं।

 

उन्होंने उनसे अपने नाम का अर्थ पूछा था। तब उन्होंने कहा था, अमिताभ का अर्थ है सूर्य, और यह गौतम बुद्ध का एक नाम भी है। अब्बास साहब ने अमिताभ से साफ कह दिया था कि वे इस फिल्म के मेहनताने के रूप में पाँच हजार रुपए से अधिक नहीं दे सकेंगे। इसके बाद जब अनुबंध पर लिखा-पढ़ी की नौबत आई। अमिताभ की वल्दियत पूछी गई तो कवि

 

 

 

बच्चन के सुपुत्र होने के नाते अब्बास साहब ने साफ कह दिया कि वे उनके पिता से इजाजत लेकर ही उन्हें काम देंगे। अमिताभ को कोई आपत्ति नहीं थी। अंततः उन्हें चुन लिया गया। 1969 में जब अमिताभ की यह पहली फिल्म (सात हिन्दुस्तानी) दिल्ली के शीला सिनेमा में रिलीज हुई, तब अमिताभ ने पहले दिन अपने माता-पिता के साथ इसे देखा।

 

 

उस समय अमिताभ जैसलमेर में सुनील दत्त की फिल्म रेशमा और शेरा की शूटिंग से छुट्टी लेकर सिर्फ इस फिल्म को देखने दिल्ली आए थे। उस दिन वे अपने पिता के ही कपड़े कुर्ता-पाजामा शॉल पहनकर सिनेमा देखने गए थे, क्योंकि उनका सामान जैसलमेर और मुंबई में था। इसी शीला सिनेमा में कॉलेज से तड़ी मारकर उन्होंने कई फिल्में देखी थीं। उस दिन वे खुद की फिल्म देख रहे थे।

 

 

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मीना कुमारी द्वारा प्रशंसा

अब्बास साहब अपने ढंग के निराले फिल्मकार थे। उन्होंने कभी कमर्शियल सिनेमा नहीं बनाया। उनकी फिल्मों में कोई न कोई सीख अवश्य होती थी। यह फिल्म चली नहीं, लेकिन प्रदर्शित हुई, यही बड़ी बात थी। रिलीज होने से पहले

 

मीनाकुमारी ने इस फिल्म को देखा था। अब्बास साहब मीनाकुमारी का बहुत आदर करते थे। वे अपनी हर फिल्म के ट्रायल शो में उन्हें जरूर बुलाते थे। वे उनकी सर्वप्रथम टीकाकार थीं। ट्रायल शो में मीनाकुमारी ने अमिताभ के काम की तारीफ की थी, तब अमिताभ लजा गए थे।

 

 

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संघर्ष जारी था amitabh bachchan

संघर्ष के दिनों में अमिताभ को मॉडलिंग के ऑफर मिल रहे थे, लेकिन इस काम में उनकी कोई रुचि नहीं थी। जलाल आगा ने एक विज्ञापन कंपनी खोल रखी थी, जो विविध भारती के लिए विज्ञापन बनाती थी। जलाल, अमिताभ को वर्ली के एक छोटे से रेकॉर्डिंग सेंटर में ले जाते थे और एक-दो मिनट के विज्ञापनों में वे अमिताभ की आवाज का उपयोग किया करते थे।

 

 

प्रति प्रोग्राम पचास रुपए मिल जाते थे। उस दौर में इतनी-सी रकम भी पर्याप्त होती थी, क्योंकि काफी सस्ता जमाना था। वर्ली की सिटी बेकरी में आधी रात के समय टूटे-फूटे बिस्कुट आधे दाम में मिल जाते थे। अमिताभ ने इस तरह कई बार रातभर खुले रहने वाले कैम्पस कॉर्नर के रेस्तराओं में टोस्ट खाकर दिन गुजारे और सुबह फिर काम की खोज शुरू।

 

 

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रेशमा और शेरा में गूँगे अमिताभ amitabh bachchan

सुनील दत्त की ‘रेशमा और शेरा’ डाकू समस्या पर बनी फिल्म थी और इसकी नायिका वहीदा रहमान थीं। अमिताभ ने इसमें एक गूँगे का रोल किया था, यानी उन्हें सिर्फ भावाभिनय करने का अवसर ही दिया गया था। कहते हैं कि इस फिल्म में पहले अमिताभ के भी डायलॉग थे, लेकिन बाद में वे डायलॉग विनोद खन्ना को दे दिए गए।

 

 

अगर दत्त साहब ने उस फिल्म में अमिताभ से संवाद बुलवाए होते तो स्वयं उनके संवाद फीके पड़ जाते। अमिताभ की पसंद के खास हीरो-हीरोइन दिलीप कुमार और वहीदा रहमान हैं। ‘रेशमा और शेरा’ में गूँगे अमिताभ का विवाह वहीदा रहमान से कराया गया था। यह अमिताभ का पहला फिल्मी विवाह था।

 

अमिताभ बच्चन की पहली फिल्म कब रिलीज हुई

दोस्तों फिल्मों में अमिताभ बच्चन की शुरुआत वौइस् नरेटर के तौर पर हुई और उन्होंने फिल्म भुवन शोम के लिए अपना आवाज़ दिया आगे चलकर राजिव गाँधी से दोस्ती होने की वजह से उन्हें फिल्मों में आने के लिए ज्यादा

 

 

परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ा और 7 नवंबर 1969 को अमिताभ बच्चन की पहली फिल्म सात हिन्दुस्तानी रिलीज हुई लेकिन ये फिल्म फ्लॉप रही लेकिन इसके बावजूद अमिताभ ने हार नहीं मानी और 1970 में बॉम्बे टॉकी फिल्म में काम किया लेकिन ये फिल्म भी सफल नहीं हो सकी फिर इसके बाद अमिताभ ने एक और फिल्म परवाना में काम किया लेकिन ये फिल्म भी बुरी तरह से पिट गई

 

 

 

 

 

अनवर अली की मेहरबानी amitabh bachchan

कलकत्ता में अपनी सारी पगार दोनों भाई स्वयं पर खर्च कर डालते थे और माँ-बाप से भी पैसे मँगा लिया करते थे, लेकिन इस बार अमिताभ यह प्रतिज्ञा करके बंबई आए थे कि घर से कोई मदद नहीं लेंगे। अमिताभ जब बंबई आए, तब तक बंटी स्वयं ही मद्रास से स्थानांतरित होकर बंबई में कोलाबा की एक लॉज में आकर ठहर गए थे।

 

 

 

शुरू में अमिताभ भी उन्हीं के साथ रहे, लेकिन छः महीने बाद शॉ वॉलेस कंपनी ने अजिताभ को फिर मद्रास बुला लिया। पहली दो फिल्मों की कमाई से आखिर कितने दिन काम चल सकता था। अब तो रहने के लिए खोली के भी वांदे पड़ गए।

 

 

वे अपने माता-पिता की एक परिचित शंकरीबाई खेतान के मरीन ड्राइव स्थित मकान में रहने लगे, लेकिन वह जगह फिल्मी क्षेत्र से दूर पड़ती थी। ऐसे संकट के समय हास्य अभिनेता मेहमूद के भाई अनवर अली, जिन्होंने ‘सात हिन्दुस्तानी’ फिल्म में अमिताभ के समान ही एक रोल किया था, फरिश्ते की तरह मदद को आए।

 

 

 

वे अंधेरी में मेहमूद भाईजान के बंगले के एक फ्लैट में रहते थे। मेहमूद ने उन्हें एक लाल जगुआर गाड़ी भी दे रखी थी। अमित भी अनवर के साथ रहने लगे थे। दोनों काम की तलाश में एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो साथ-साथ ही जाया करते थे।

 

 

 

 

ऋषिदा से मुलाकात amitabh bachchan

ऋषिकेश मुखर्जी से अमिताभ बच्चन का परिचय अब्बास साहब ने ही कराया था। वे उन्हें लेकर ऋषिदा की बांद्रा स्थित खोली पर गए थे। कहा था- ‘यह मेरे परिचित हरिवंशराय बच्चन का लड़का है। इसने मेरी फिल्म ‘सात हिन्दुस्तानी’ में बहुत अच्छा काम किया है।

 

 

यह काम की तलाश में है। इसे अपनी किसी फिल्म में काम जरूर दीजिए।’ उन दिनों ऋषिकेश मुखर्जी ‘आनंद’ बनाने की सोच रहे थे। इस कहानी को उन्होंने राजेंद्रकुमार से लेकर जेमिनी के एस.एस. वासन तक को सुनाया था। तब सभी ने कहा था- इसमें रोमांस नहीं है।

 

 

हीरो के सामने कोई हीरोइन नहीं है। किशोर कुमार और शशिकपूर से भी उन्होंने संपर्क किया था, पर बात बनी नहीं। तभी राजेश खन्ना इस फिल्म में काम करने के लिए अचानक तैयार हो गए। अब उन्हें डॉक्टर की भूमिका के लिए किसी

 

 

अभिनेता की जरूरत थी और ऐसे में अब्बास साहब अमिताभ को लेकर उनके पास पहुँचे थे। इसके बाद उन्होंने ‘सात हिन्दुस्तानी’ फिल्म भी देख डाली और इस नतीजे पर पहुँचे कि बाबू मोशाय की अंतर्मुखी भूमिका के लिए अमिताभ का जन्म हुआ है।

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