dharmik katha मोक्ष प्राप्ति का मार्ग

नमस्कार दोस्तो आज हम आपके लिए एक ऐसी धार्मिक कथा लेकर आए है जिसे पढ़ने के बाद आपको इस बात का ज्ञान प्राप्त होगा की मोक्ष की प्राप्ति का सबसे उत्तम मार्ग क्या है | dharmik katha मोक्ष प्राप्ति का मार्ग  की इस पोस्ट क आखिर तक पढ़े |

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तो चलिये कथा का आरंभ करते है |

 

dharmik katha मोक्ष प्राप्ति का मार्ग

वैशाली नगर के एक बहुत बड़े राजा हुए, राजा हर्षवर्धन. राजा की ईश्वर पर बड़ी आस्था थी. राजा के पूर्वजों से यह बात चली आरही थी की उनके सभी पूर्वजों ने भक्ति का मार्ग अपना कर मोक्ष प्राप्त किया है मात्र एक ईश्वर भक्ति जैसा पुण्य कर्म करके मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है.

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एक बहुत बड़े संत दुनिया भर का भर्मण करते हुए वैशाली नगर पहुंचे. राजा तक ज़ब यह बात पहुंची की

 

एक संत जो की बहुत बड़े ज्ञानी महात्मा परुष है वेदों का अच्छा ज्ञान है उनका वैशाली नगर मे आगमन हुआ है.

 

राजा तुरंत संत को अपने महल मे लाया, खूब सेवा की.

संत ने राजा से पूछा की किसी बात को लेकर चिंतित जान पड़ते हो राजन, यदि कोई सवाल है मन मे तो पूछ लो.

 

राजन ने अपने सवाल संत जी के सामने रखते हुए कहा. हे ज्ञानी महात्मा! क्या ईश्वर भक्ति जैसे धर्म कर्म का रास्ता अपना कर मोक्ष प्राप्त कर पाना सम्भव है.

 

ज्ञानी संत ने उत्तर दिया, हे राजन, अगर हम सीधे तौर पर आपके पश्न का उत्तर दें तो आप उस उत्तर से कादचित संतुष्टि प्राप्त नहीं कर पाओगे.

 

सच्ची ईश्वर की भक्ति से मोक्ष प्राप्ति होती है, इस कथन मे कितनी सत्यता है  यह जानने के लिए आपको सम्पूर्ण ईश्वर भक्ति को विस्तार से समझना होगा.

 

क्योंकि सम्पूर्ण ईश्वर भक्ति ही आपको मोक्ष के द्वार तक लेकर जाती है. और सम्पूर्ण ईश्वर भक्ति का आधार है पुण्य कर्म. जितना अधिक आप जीवन मे पुण्य कर्म करोगे आपके मोक्ष प्राप्ति का मार्ग उतना ही आसान होता चला जाएगा.

 

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मोक्ष प्राप्ति का इतना सहज नहीं इसके लिए  मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखना अति अवश्यक है | मोक्ष प्राप्ति का पहला नियम यही है – अपने लोभ – मोह – वासना – घृणा – ईर्षा – क्रोध  जैसे सभी विकारो पर विजय प्राप्त करना होता है ताकि धर्म कर्म के मार्ग पर यह आपके लिए बाधा उत्तपन्न न करे |

 

dharmik-katha

हे राजन, हर धर्म   कर्म हो सकता है किन्तु हर कर्म,  धर्म नहीं हो सकता.

 

पुण्य कर्म करते समय तुम्हे धर्म कर्म दोनों को साथ लेकर चलना होगा.

 

तुम्हारे द्वारा किये जाने वाली किसी भी प्रकार की क्रियाओ से किसी भी मनुष्य एवं जीव जंतुओ को हानि ना पहुंचे.

 

राजन ने सवाल किया, की पुण्य कर्म क्या होते है.

 

संत ने उत्तर दिया, ज़ब इंसान अपने किसी भी स्वार्थ की वजह से किसी की मदद करता है तो यह एक साधारण कर्म है.

 

ज़ब  मनुष्य निःस्वार्थ भाव से अपने या अपनों के लिए जैसे कोई भी जान पहचान वाले के लिए सेवा मदद करता है तो वह कर्म एक सद कर्म कहलाता है.

 

ज़ब भी मनुष्य नजीवन मे अपनों के साथ साथ उन सभी मनुस्य एवं जीवो के लिए निःस्वार्थ भाव से सेवा मदद करता है तो वह पुण्य कर्म कहलाता है.

 

जैसे किसी ऐसे इंसान की मदद कर देना या करते रहना जिससे उसका इंसानियत के सिवा और कोई रिश्ता ना हो, जिससे उसका कोई निजी स्वार्थ ना जुडा हो.

 

  • घर के बाहर पशु पक्षियों के लिए दाना पानी रखना.
  • चीटियों, को आटा डालना, आवारा पशुओं की मदद,
  • मुसीबत मे फंसे किसी भी मनुष्य एवं जीव जंतु की मदद करना.

 

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यह सब पुण्य कर्मो का उदाहरण है. अतः पुण्य कर्म की ही सबसे उत्तम कर्म माना गया है. लेकिन यह सब कुछ धर्म कर्म के साथ करना होगा.

धर्म यानी परिवार, समाज और संसार के हर जीव प्राणी के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए हर जिम्मेदारी को सच्ची निष्ठां से निभाना और हर कार्य को पूरी ईमानदारी से पूर्ण करना.

बिना धर्म के पुण्य कर्म अधूरा है और बिना पुण्य कर्म के ईश्वर भक्ति कभी सम्पूर्ण नहीं हो सकती |

अब रही बात ईश्वर भक्ति की तो  सच्ची भक्ति मे बहुत शक्ति होती है बड़े बड़े काज सफल हो जाते है , जीवन की मुश्किलों से  उबरा जा सकता है ,

पूरी श्रद्धा भाव से ईश्वर की पूजा करना, कीर्तन भजन करना, माला जपना, हवन करना,धर्म यात्रा करना,सत्संग करवाना या सुनना, यह सब बहुत ही अच्छे कर्म माने गए है. ईश्वर की ऐसी भक्ति करने से जीवन मे सुख सुकून समृद्धि की प्राप्ति होती है, जीवन मंगल मय हो जाता है. यानी भक्ति से बहुत कुछ प्राप्त किया जा सकता है लेकिन मोक्ष और अमरता नहीं.

लेकिन मोक्ष का रास्ता इसी भक्ति से होकर ही निकलता है क्योंकि हर वक़्त ईश्वर की भक्ति मे डूबा रहना वाला इंसान अध्यात्म ज्ञान की प्राप्ति करने लगता है.

 

अध्यात्म ज्ञान इंसान को बुरे कर्म और अधर्म करने से रोकती है. जिस वजह से मनुष्य के मन मे सकारात्मक विचारों का ही जन्म होता है. जिससे वह पुण्य कर्मो की और अग्रसर होता है.

 

पूरी श्रद्धा भाव से ईश्वर की पूजा करना, कीर्तन भजन करना, माला जपना, हवन करना,धर्म यात्रा करना,सत्संग करवाना या सुनना,यह सब पूर्णतः ईश्वर की भक्ति नहीं है,

 

जबकि ईश्वर की सच्ची भक्ति सिर्फ यहीं तक सिमित नहीं होती… बल्कि भूखे को खाना खिलाना, प्यासे को पानी पिलाना से लेकर हर पुण्य कर्म करना ही सम्पूर्ण ईश्वर भक्ति कहलाता है.

बिना दान पुण्य और पुण्य कर्मो के ईश्वर भक्ति कभी सम्पूर्ण नहीं हो सकती. सोच कर देखो कोई भूखा प्यासा आपके द्वार से वापिस लौट जाए या फिर मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे भूखे गरीब लोग आपकी ओर देखते रहे और आप उन्हे नज़रअंदाज़ करके मंदिर मे ईश्वर को भोग लगते फिरे तो क्या फाइदा एसे धर्म कर्म का एसी भक्ति का सब व्यर्थ है |

यानी  धर्म की संपूर्णता पुण्य कर्मो के बिना अधूरी है |

 

राजा को संत की सारी बात अब समझ आ चुकी थी. उसी दिन से राजा पुण्य कर्म कमाने के लिए धर्म कर्म मे जुट गया यानी सम्पूर्ण ईश्वर भक्ति करने लगा.

dharmik katha मोक्ष प्राप्ति का मार्ग

तो दोस्तों उम्मीद करता हूं आपको dharmik katha मोक्ष प्राप्ति का मार्ग  मे यह  समझ गए होंगे की मोक्ष कैसे प्राप्त किया जाता है. इस dharmik katha मोक्ष प्राप्ति का मार्ग को अधिक से अधिक लोगो मे शेयर करे ताकी उनके मन से मोक्ष के प्रति जो गलत फहमियाँ है वो दूर हो सके |और सही मार्ग अपना कर मोक्ष प्राप्ति कर सके |

 

 

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