Indian fundamental rights hindi | मौलिक अधिकार सम्पूर्ण जानकारी

Indian Fundamental rights hindi – भारतीय मौलिक अधिकारनमस्कार दोस्तों 🙏 मैं हरजीत मौर्या आज अपनी इस पोस्ट के माध्यम से भारतीय मौलिक अधिकार (indian fundamental rights hindi) के बारे मे विस्तारपूर्वक जानकारी साँझा करने जा रहा हूं. 

 

एक भारतीय का सामाजिक एवम आर्थिक रूप से विकसित होने मे सबसे ज़ादा महत्व मौलिक अधिकारों का होता है. 

अब आप इस बात का अंदाजा यही से लगा लीजिये की मौलिक अधिकारों की कितनी बड़ी इम्पोर्टेंस है. 

 

भारतीय संविधान के  तृतीय भाग में नागरिकों के मौलिक अधिकारों (fundamental rights) की विस्तृत व्याख्या की गयी है. यह अमेरिका के संविधान से ली गयी है. मौलिक अधिकार व्यक्ति के नैतिक, भौतिक और आध्यात्मिक विकास के लिए अत्यधिक आवश्यक है. जिस प्रकार जीवन जीने के लिए जल आवश्यक है, उसी प्रकार व्यक्तित्व के विकास के लिए मौलिक अधिकार. मौलिक अधिकारों (fundamental rights) को 6 भागों में विभाजित किया गया है –

 

आज इस पोस्ट को पढ़ने के बाद आप को इन सवालों का जवाब अपने आप मिल जाएगा की

  • मौलिक अधिकार (fundamental rights) के फायदे क्या है,? 
  • इसके प्रति हर भारतीय की क्या जिम्मेदारी बनती है? 
  • और हर भारतीय के लिए अपने मौलिक अधिकारों (fundamental right) को जानना क्यों और  कितना जरुरी है? 

 

आज की इस पोस्ट मे हम जानेंगे –

  1. मौलिक अधिकार क्या है? What is fundamental rights
  2. मौलिक अधिकार कौन कौन से है? Which are the Fundamental Rights?
  3. मौलिक अधिकार कब और क्यों बनाए गए? When and why were fundamental rights created?
  4. मौलिक अधिकार से नागरिक को क्या फायदे है? What is the benefit to the citizen from the Fundamental Rights?

 

 

fundamental rights hindi | मौलिक अधिकार सम्पूर्ण जानकारी

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भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों की खास बातें –

 

दोस्तों हमारे भारत का संविधान दुनियां का सबसे बड़ा संविधान है. सिर्फ यही नहीं, जितने ज़ादा मौलिक अधिकार (fundamental rights) भारतीय संविधान द्वारा भारतीय नागरिकों को दिये गए है, शायद ही दुनियां का कोई ऐसा देश होगा जिसने इतने सारे human rights अपने देश के लोगो को दिये होंगे. 

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 मौलिक अधिकारों को ध्यान मे रखते हुए संविधान इस बात का खास ध्यान रखता है की कोई इन अधिकारों का हनन (उल्लंघन) ना करें. अथवा राज्यों द्वारा बनाए जाने वाले कानूनों से मौलिक अधिकारों को कोई हानी ना पहुंच रही हो. 

इसलिए भारतीय संविधान,ने मौलिक अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी न्यायपालिका को दे दी है. न्यायपालिका मौलिक अधिकारों की रक्षा करती है.

हर भारतीय को अपने मौलिक अधिकारों के बारे अच्छे से पता होना चाहिए. मौलिक अधिकार (fundamental rights) भारतीय संविधान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है. 

 

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1.भारतीय संविधान मे लिखें मौलिक अधिकारों को संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से लिया गया है .

 

  1. मौलिक अधिकारों का विस्तृत वर्णन संविधान के भाग -3 के अनुच्छेद 12 से लेकर अनुच्छेद 35 तक है. 

 

 

भारतीय संविधान के भाग 3 को मेग्नाकाटा क्यों बोला जाता है.? 

भारतीय संविधान का बहुत सारा हिस्सा जिसमे से मौलिक अधिकार  (fundamental rights) US के संविधान से लिया गया है. 

 

दोस्तों ! जो ब्रिटीशियर्स होते है वो अपने संविधान की समरी को मेग्नाकाटा बोलते है. ब्रिटीशियर्स के संविधान मे जो समरी है वो उसे बहुत ही इम्पोर्टेन्ट मानते है. इसी वजह से उन्होंने इस समरी को मेग्नाकाटा का नाम दिया. यह समरी उनके संविधान के भाग 3 मे लिखी है. 

 

तो ठीक उसी प्रकार हमारे संविधान मे भी जो मौलिक अधिकार है वो पूरे संविधान मे सबसे ज़ादा महत्वपूर्ण माने गए है जो की भारतीय के संविधान के भाग 3 मे है. . इसी वजह से 

भारतीय संविधान के भाग 3 को मेग्नाकाटा बोला  जाता है

भारतीय मौलिक अधिकार कहाँ से कहाँ तक है?

 दोस्तों हमारे मेन मौलिक अधिकार अनुच्छेद 14 (आर्टिकल) right to equality से शुरू होते है. लेकिन इससे पहले के जो दो आर्टिकल (अनुच्छेद) है ! 12 और 13  उनके बारे मे भी बात कर लेते है. 

 

हमारे भारतीय संविधान का अनुच्छेद 12 बोलता है की भारत देश के अंदर जितनी भी ऑर्गेनाइजेशन है, जितने भी राज्य है उन सभी को एक यूनियन के अंडर कंसीडर किया जाएगा. 

 

कहने का मतलब कल को ममता बैनर्जी यह बोल दे की बंगाल को हम अलग देश बनाने जा रहे है… या फिर भारत का कोई भी राज्य का मुख्यमंत्री ये बोले की हम अपना भारत से अलग देश बनाना चाहते है. 

 

तो ऐसा हरगिज़ नहीं हो सकता…

क्यों नहीं हो सकता?    क्योंकि आर्टिकल 12 इस बात की कतई मंजूरी नहीं देता की भारत का कोई भी राज्य या ऑर्गेनाइजेशन भारत से अलग होकर खुद की आइडेंटिटी बना लें.  

 

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यानी कुल मिलाकर भारत की सीमा के अंदर हर राज्य भारत का अभिन्न अंग है.एक परिवार है.  इसे कोई भी मंत्री, या ऑर्गेनाइजेशन अलग नहीं कर सकता. आर्टिकल 12 भारत की अंखण्डता एवं प्रभुता को बनाए रखने मे सबसे बड़ी भूमिका निभाता है. 

 

तो दोस्तों ये आर्टिकल 12 ही है जो ऐसी ढाल बन कर खड़ा है की अब तक सभी राज्य भारत का अभिन्न अंग बने हुए है  वरना लालची नेता मंत्री लोग तो कब का बेच दिये होते. 

 

चलिए अब बढ़ते है आर्टिकल 13 की तरफ. 

 

दोस्तों ! भारतीय संविधान का आर्टिकल 13 कहता है की कोई भी राजनैतिक ताकत अगर मौलिक अधिकारों से किसी भी प्रकार की छेड़खानी करता है यानी उन्हें कम करने  या दबाने की कोशिश मात्र भी करता है तो उसी समय उस राजनैतिक ताकत को नष्ट कर दिया जाएगा. यानी उसकी सभी शक्तियां छीन कर पद से निलंबित कर दिया जाएगा. 

 

यानी कोई भी मंत्री या न्यायालय मौलिक अधिकारों का हनन नहीं कर सकता, हाँ ! बढा जरूर सकता लेकिन कम अथवा खत्म नहीं कर सकता. 

 

बस एक परिस्थिति को छोड़ कर और वो है राष्ट्रीय आपातकाल. 

 सिर्फ और सिर्फ राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान ही मौलिक अधिकारों मे संशोधन  किया जा सकता है. 

 

इस दौरान भी, जीवन एवं व्यकितिगत स्वतंत्रता के अधिकार को छोड़कर अन्य मौलिक अधिकारों को कुछ समय के लिए रोका जा सकता है. 

अन्यथा भारतीय संविधान इस बात की इज़ाज़त किसी को नहीं देता की मौलिक अधिकारों से छेड़ छाड़ की जा सकें. 

 

पहले होते थे 7 मौलिक अधिकार  – fundamental rights hindi

 

1970.ईo मे भारतीय संविधान मे 7 मौलिक अधिकार हुआ करते थे. लेकिन  44 वें संविधान संशोधन के द्वारा संपत्ति का अधिकार को मौलिक अधिकार की सूची से हटाकर इसे संविधान के अनुच्छेद 300 ( a ) के अन्तगर्त क़ानूनी अधिकार के रूप में रखा गया है . 

 

ऐसा क्यों किया गया? इसके बारे विस्तार से बताएंगे लेकिन उससे पहले हम अभी के बाक़ी बचे उन 6 मौलिक अधिकारों के बारे मे जानते है जो हर भारतीय के आर्थिक, सामाजिक एवं उसके सम्मान की रक्षा करती है. 

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हर भारतीय को अपने मौलिक अधिकारों के बारे अच्छे से जानकारी होनी बहुत जरुरी है. 

 

संविधान मे दिये गए किसी भी क़ानून को बदल देना, या हटा देना, उसमे बदलाव कर देना, या नया जोड़ देना संविधान संशोधन कहलाता है. 

 

भारतीय नागरिकों के 6 मौलिक अधिकार – 6 fundamental rights hindi

 

  1. समता या समानता का अधिकार ( अनुच्छेद 14 से अनुच्छेद 18 ) 
  2. स्वतंत्रता का अधिकार ( अनुच्छेद 19 से 22 ) 
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार ( अनुच्छेद 23 से 24 )
  4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार ( अनुच्छेद 25 से 28 ) 
  5. संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार ( अनुच्छेद 29 से 30 )
  6. संवैधानिक अधिकार ( अनुच्छेद 32 ) 

 

चलिए अब इनके बारे विस्तार से जानते है. 

 

  1. समता या समानता का अधिकार : right to equality 

 

अनुच्छेद 14 : विधि के समक्ष समता-right to equality 

 

 इसका अर्थ यह है कि राज्य सभी  व्यक्तियों के लिए एक समान कानून बनाएगा तथा उन पर एक समान ढंग से उन्हें लागू करेगा .

 

यानी राज्यों मे जो भी क़ानून बनाए जाएंगे वो उस राज्य मे रहने वाले सभी लोगो के हित को ध्यान मे रखते हुए समान रूप से बनाए जाए. 

 

भारत मे बनने वाले क़ानून सभी भारतीय नागरिकों पर बिना किसी भेद भाव के  एक समान रूप से लागू होंगे. 

 

उदाहरण के तौर पर भारतीय यातायात क़ानून मे यातायात के सभी नियम हर इंसान के लिए एक समान है.. फिर चाहे वो गरीब हो या अमीर, नेता हो या फ़िल्म स्टार, लड़का हो या लड़की. 

 

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अनुच्छेद 15 : धर्म , नस्ल , जाति , लिंग या जन्म – स्थान के आधार पर भेद – भाव का निषेद- 

 

यानी भारत मे किसी भी भारतीय के साथ  धर्म ,रंग रूप, मूलवंश , जाति , लिंग एवं जन्म – स्थान आदि के आधार पर किसी बहुत प्रकार भेद भाव नहीं किया जा सकता. 

 

यदि कोई ऐसा करता है तो इसे मौलिक अधिकारों पर आघात माना जाएगा. ऐसा करने वाले पर कानूनी कारवाही की जाएगी. और तुरंत सुनवाई का प्रावधान है. क्योंकि भारत मे किसी भी भारतीय के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव करना कानूनन अपराध है. 

 

एक जरुरी बात और ! कोई भी राज्य जैसे मान लो पंजाब, 

 

तो ऐसा नहीं की पंजाब मे सिर्फ पंजाबी ही रहेंगे कोई दूसरा आकर पंजाब मे नहीं बस सकता. कोई भी राज्य ऐसा नहीं कर सकता. 

 

क्योंकि संविधान कहता है की कोई भी राज्य किसी खास धर्म, जाती, या नस्ल वालो का आदिपत्य (जागीर) नहीं है. भारत के किसी भी राज्य का रहने वाला कोई भी भारतीय नागरिक भारत के किसी भी राज्य मे जा कर बस सकता है. नौकरी या कारोबार कर सकता है. एवं वहाँ की सम्पति खरीद सकता है. 

 

अनुच्छेद 16 : लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता- 

 

संविधान का यह अनुच्छेद कहता है की. – राज्य के अधीन किसी पद पर ज़ब भी कोई नियोजन या नियुक्ति हो तो इस  से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समानता होगी . 

 

उदाहरण के तौर पर मान लो राजस्थान मे नियुक्तियां/नौकरी  निकलती है तो उसकी जानकारी सार्वजनिक रूप से हर भारतीय नागरिक को देनी होगी. ताकी वो इस भर्ती के लिए नियुक्ति पत्र भर सकें. 

 

ऐसा नहीं होगा की कोई सरकारी भर्ती निकली और उसे गुपचुप तरीके से अपनी मर्जी से कर लिया. 

भर्ती राज्य के हर नागरिक के लिए एक समान रूप से होगी बिना किसी भेद भाव के. 

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यह अनुच्छेद सिर्फ सरकारी नौकरी के पदों पर लागू होती है. 

 

अनुच्छेद 17 : अस्पृशयता का उन्मूलन. (Abolution of untouchability)

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 कहता है की  भारत मे कोई भी आपसे छुआछूत जैसी क्रिया नहीं कर सकता. ये एक कानूनन अपराध है. 

 

यानी पहले दोस्तों.. ऐसा हुआ करता था की जो बहुत नीची जाती के गरीब लोग होते थे उन्हें मंदिर मे भी नहीं आने दिया जाता था. 

उनका मानना था की इनके छूने से या इनके यहां आने से वो जगह अपवित्र हो जाएगी…. तो उस समय  ऐसा छुआछूत का भेद भाव जैसा कल्चर चला करता था. 

 

लेकिन आज के डेट मे, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 ने इस कल्चर को समाप्त कर दिया है. 

 

अनुच्छेद 18 : उपाधियों का अंत- यानी पदों (position) का अंत. 

यहां पर पदों का अंत से मतलब है की पहले जो राजा, महाराजा, या सुल्तान या गाज़ी की उपाधियाँ हुआ करती थीं. तो अब इन पदों को भारत मे कोई धारण नहीं कर सकता. अनुच्छेद 18 के तहत  इन पदों एवं उपाधियों को खत्म कर दिया गया है. 

 

अकेडमिक, और सेना के पद, उपाधि (टाइटल) को छोड़ कर अन्य सभी पद खत्म कर दिये जाए. 

 

अकेडमिक टाइटल का अर्थ होता है जैसे, नाम के आगे  इंजिनियर लगाना, डॉक्टर लगाना, एडवोकेट लगाना आदि. 

 

ठीक इसी प्रकार सेना के टाइटल जैसे, नाम के आगे मेजर लगाना, कर्नल लगाना, कैप्टन, IAS या IPS जैसे टाइटक. 

 

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 सेना या विधा संबंधी सम्मान के सिवाए अन्य कोई भी उपाधि राज्य द्वारा प्रदान नहीं की जाएगी . भारत का कोई नागरिक किसी अन्य देश से बिना राष्ट्रपति की आज्ञा के कोई उपाधि स्वीकार नहीं कर सकता है . 

 

2.स्वतंत्रता का अधिकार : right to fridom 

 

 अनुच्छेद 19-  मूल संविधान में 7 तरह की स्वतंत्रता का उल्लेख था , अब सिर्फ 6 हैं : दोस्तों आर्टिकल 19 कप संविधान की रीढ़ की हड्डी माना जाता है. 

 

स्वतंत्रता का अधिकार मे बहुत से चीजों की स्वतंत्रता को लेकर बात कही गई है जिसमे हर भारतीय नागरिक को  बहुत से अधिकार दिये गए है जिन्हे अलग अलग श्रेणियों जैसे – 19(a), 19(b), 19(c), 19(d), 19(e), 19(f), 19(g) के तहत explain किया गया है. 

 

चलिए इन सभी श्रेणियों थोड़ा सा विस्तार से समझते है. 

 

19 ( a ) बोलने की स्वतंत्रता . Right to speech

19(a) हर भारतीय नागरिक को  बोलने की स्वतंत्रता देता है. यहां पर बोलने की स्वतंत्रता से अभिप्राय है की आप कहीं भी अपनी बात स्वतंत्र रूप से रख सकते है. अपने विचार और भाव प्रकट कर सकते हो. 

 

आप सार्जनिक स्थानों पर  भाषण दे सकते है लेकिन शांतिपूर्ण तरीके से. भाषण देते समय आपत्तिजनक शब्दों एवं भड़काऊ शब्दों का प्रयोग नहीं कर सकते. 

 

19 ( b ) शांतिपूर्वक बिना हथियारों के एकत्रित होने और सभा करने की स्वतंत्रता .

भारतीय संविधान के इस आर्टिकल के तहत हर भारतीय को यह अधिकार दिया जाता है की वह शांतिपूर्ण तरीके से  सभा एकत्रित कर सकता है. भाषण दे सकता है. किसी भी चीज के खिलाफ प्रोटेस्ट यानी धरना एवं आंदोलन कर सकता है. यह हर भारतीय का मौलिक अधिकार है. 

 

अभि जल्दी ही मे आप सबने इसका जीता जागता सबूत देखा था. फिर चाहे वो कश्मीर से धारा 301 को हटाने को लेकर हो या फिर किसान मुद्दा. 

 

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19 ( c ) संघ बनाने की स्वतंत्रता . Right to make the union 

भारतीय संविधान का 19(c) हर भारतीय को ये अधिकार देता है की  वो स्वतंत्र रूप से संघ (राजनैतिक पार्टी ) का गठन कर सकता है. उदाहरण के तौर पर जैसे  अरविन्द केजरीवाल जी ने “आम आदमी पार्टी” का गठन किया. 

 

सिर्फ यही नहीं, आप भारत मे कहीं भी  स्वतंत्र रूप से किसी कम्पनी या ऑर्गेनाइजेशन का गठन भी कर सकते हो. 

 

19 ( d ) देश के किसी भी क्षेत्र में आवागमन की स्वतंत्रता . Freedom of movment 

भारतीय संविधान का आर्टिकल 19 (d) हर भारतीय को भारत के किसी भी हिस्से मे आने जाने की स्वतंत्रता प्रदान करता है. 

 

कही भी आने जाने का मतलब यह नहीं की आप अब कहो की मैं आर्मी कंटेंट जोन के अंदर जाना चाहता हूं. या ऑपरेशन थियेटर मे जाना चाहता हूं. 

जी नहीं ! ऐसा चलेगा. 

बहुत सि रिस्ट्रिक्टेड एरिया ऐसे भी है जहाँ हर कोई नहीं जा सकता. 

 

अगर हमें कुछ मौलिक अधिकार दिये गए है तो वह भी कुछ कानूनी दायरे से बंधे है ताकी कोई इन आजादी का गलत निर्वाह ना कर सकें. 

 

19 ( e ) देश के किसी भी क्षेत्र में निवास करने और बसने की स्वतंत्रता . ( अपवाद जम्मू – कश्मीर ) 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(e) हर भारतीय को भारत के किसी भी क्षेत्र मे जाकर बसने एवंम वहाँ व्यापार करने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है. 

 

अब यहां पर साथ मे “अपवाद जम्मू – कश्मीर” क्यों लिखा है?  

देखिये दोस्तों बात अगर 2019 से पहले की करें तो जम्मू और कश्मीर आप जा तो सकते थे लेकिन वहाँ कोई जमीन नहीं खरीद सकते थे ना ही कोई व्यापार कर सकते थे. सिर्फ यही नहीं और भी बहुत सि ऐसी रिस्ट्रिक्शन थीं जो सिर्फ जम्मू और कश्मीर जैसे राज्य पर लगी थीं. 

 

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ऐसा क्यों किस वजह से और क्यों  ? तो इसकी सबसे बड़ी वजह थीं जम्मू और कश्मीर पर लगी हुई धारा 370 और 35(A) था. 

 

अब ये धारा 370 और 35(A) क्या था? क्यों लगाया गया था और क्यों हटा दिया गया? ये जानने के लिए यहां clik करो 

 

लम्बे समय से प्रधानमंत्री मोदी जी के द्वारा 5 अगस्त  2019 को अथक प्रयास से जम्मू और कश्मीर से यह धारा हटा दी गई. 

 

19 ( f ) कोई भी व्यापार एवम जीविका चलाने की स्वतंत्रता  Freedom of profetion and occupation

 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(f) हर भारतीय को किसी भी प्रकार के व्यापार को चुनने अथवा करने की पूरी स्वतंत्रता है. 

 

मान लो आप नाइ  काम, कुकिंग का काम  शुरू करना चाहते हो तो आप ज़ब मर्जी शुरू कर सकते हो. 

 

यानी आपको कोई रोकने वाला नहीं क्योंकि ये आपका मौलिक अधिकार (fundamental right) है की आप अपनी इच्छा से कोई भी ऑक्युपेशन चुन सकते है. 

 

और यहां भी एक बात फिर से वही दोहराऊंगा की आप low and रेगुलेशन के विरुद्ध जा कर कुछ ऐसा कसम नहीं कर सकते जो किसी जीव, इंसान या देश के अहित मे हो. 

 

 

 

अनुच्छेद 20- अपराधों के लिए दोष – सिद्धि के संबंध में संरक्षण- 

 

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यह आर्टिकल कहता है की सामाजिक तौर पर किसी भी अपराध का सजा देने का हक़ सिर्फ न्यायलय का है. यानी यदि कोई बंदा अपराध करता है, तो उसकी सजा समाज या कोई व्यक्ति निर्धारित  नहीं करेगा. 

 

इसके तहत तीन प्रकार की स्वतंत्रता का वर्णन है : 

( a ) किसी भी व्यक्ति को एक अपराध के लिए सिर्फ एक बार सजा मिलेगी . 

( b ) अपराध करने के समय जो कानून है इसी के तहत सजा मिलेगी न कि पहले और बाद में बनने वाले कानून के तहत . 

( c ) किसी भी व्यक्ति को स्वयं के विरुद्ध न्यायालय में गवाही देने के लिय बाध्य नहीं किया जाएगा . स्वैच्छा द्वारा दी गई गवाही ही मान्य है. 

 

अनुच्छेद 21- प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का सरंक्षण : protection of life and personal libarty. 

जीने का अधिकार ये एक ऐसा अधिकार है जिसे आपसे किसी भी हालत मे छीना, खत्म अथवा बदला नहीं जा सकता. 

यानी आर्टिकल 21 आपको जीने का अधिकार देता है. आज की डेट मे यह अधिकार आपसे कोई नहीं छीन सकता. 

जैसे राजा महाराजा और मुग़लो के समय मे हुआ करता था की छोटे से अपराध अथवा गुस्ताखी के लिए गर्दन कलम करवा दी जाती थीं. दीवार मे चुनवा दिया जाता था. 

तो अब ऐसा नहीं कर सकता कोई. इसलिए आज के time मे यदि कोई किसी की जान लेता है फिर चाहे वो सही हो या गलत वो क़ानून हत्त्या का अपराध माना जाएगा. 

 

किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रकिया के अतिरिक्त उसके जीवन और वैयक्तिक स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है .

 

 अनुच्छेद 21(A) – निजिता का अधिकार -right to privacy  . 

निजिता के अधिकार से मतलब यह है की कोई आपकी ज़ाती जिंदगी एवम निजी मामलो मे जबरदस्ती नहीं घुस सकता. 

 

अनुच्छेद 21(B) सेहत का अधिकार -right to health 

 

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यह आर्टिकल हर भारतीय को यानी अगर वो अपराधी है, जेल की सजा काट रहा है फिर भी क़ानून को उसकी सेहत का ख्याल रखना होगा… अगर जेल मे किसी भी अपराधी की सेहत खराब होती है तो वो अपराधी को अधिकार है की वो जेलर को बोल कर अपनी सेहत की जांच करवा सकता है. और जेलर को करना पड़ेगा उसकी औकात नहीं की वो मना कर दे. 

 

 उसको अनुच्छेद 21 के तहत हॉस्पिटल रेफेर करवाया जाएगा. 

 

सिर्फ यही नहीं हर इंसान के लिए यही लागू होता है की आप अगर किसी को किसी बीमारि से पीड़ित मरता हुआ देख रहे हो उसे कोई डॉक्टरी सहायता नहीं दे रहे या उसे हॉस्पिटल नहीं लें जा रहे. तो यह क़ानून अपराध है. 

 

यदि किसी का एक्सीडेंट हो जाता है और उस घटना स्थल पर आप मौजूद हो आपके सिवा मदद के लिए और कोई नहीं है वहाँ ती ऐसे मे आपका सामाजिक कर्तव्य बनता है आप उसकी मदद करें. उसके सेहत की रक्षा करें. 

 

यदि आप इस कर्तव्य से भागते है तो यह क़ानून अपराध है. 

 

अनुच्छेद 21(c) -14 साल तक के बच्चो को मुफ्त  शिक्षा का अधिकार 

यह आर्टिकल इस बात की पुष्टि करता है भारत के अंदर 14 साल तक के हर बच्चे को मुफ्त शिक्षा का अधिकार है. इसी के द्वारा हर जिले मे सरकार ने  प्राइमरी स्कूल खुलवाए है. 

 

बिना किसी भेद भाव के कोई भी इन स्कूलों मे अपने बच्चो को पढ़ा सकता है. 

 

अनुच्छेद 21(d) न्याय मुफ्त मे मिलने का अधिकार –

यह अनुच्छेद कहता है की न्याय सभी के लिए है. यानी ऐसा नहीं है की आप अमीर हो तो न्याय आपके हक मे सुनाया जाएगा. 

जज को बिना किसी भेद भाव के फैसला सुनाना होगा न्याय करना होगा. 

 

आपको न्याय लेने के लिए किसी प्रकार का पैसा देने की जरूरत नहीं. अब इसमें वकील वाली बात नहीं आएगी.. क्योंकि वो आपको न्याय नहीं सुना रहा है. यहां पर बात न्यायपालिका एवम जज की हो रही है. 

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अनुच्छेद 21(e)हथकड़ी के विरुद्ध अधिकार –

यह अनुच्छेद हर भारतीय को यह अधिकार देता है की कब तक जुर्म साबित ना हो जाए तब तज कोई आपको हथकड़ी नहीं लगा सकता. 

 

अनुच्छेद 21(f) मारी मारी के विरुद्ध अधिकार. 

इस अनुच्छेद के अनुसार आप किसी से हाथा पाई, ज़ोर जबरदस्ती नहीं कर सकते. घर मे हो या सार्वजनिक स्थान पर. आप मारपीट नहीं कर सकते. 

 

याद रहे आपके मौलिक अधिकारों की सीमा सिर्फ वहीं तक है ज़ब तक किसी दूसरे के मौलिक अधिकारों का उलंघन (वाइलेट) ना हो रहा हो. 

 

यानी उदाहरण के तौर पर, आप रात को 12 बजे DJ लगा कर ज़ोर ज़ोर सा गाने बजाने लग जाओ…और आपको कोई रोके तो आप बोलने लगो कज नहीं यह तो मेरा right to  freedom है. मैं तो अपने घर मे बजा रहा हूं आपको क्या? 

तो अगर DJ घर मे मे बजा रहे हो तो आवाज़ भी घर के अंदर ही रखो.. 

 

एक बात आप भूल  रहे हो की आपके इस व्यवहार से दूसरों को मेंटली कस्ट,पहुंच रहा है , परेशानी हो रही है. 

 

तो ऐसे मे याद रहे की अगर आप अपने मौलिक अधिकारों का नाजायज फायदा उठा कर दूसरों के मौलिक अधिकारों को हर्ट करोगे तो वो आप पर तुरंत शोषण का केस दर्ज करा देगा. 

 

अनुच्छेद 21(g) फांसी की सजा का समय –

 

न्यायधीश  के अनुसार जिस भी अपराधी के लिए फांसी का जो समय निर्धारित किया जाता है, उसी time मे ही उस  अपराधी को फांसी दी जाएगी. एक मिनट भी आगे पीछे नहीं. 

 

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यदि गलती से भी निर्धारित समय मे फांसी नहीं हो पाई तो फांसी की सजा टल जाती है यानी उसे दोबारा फांसी नहीं दी जा सकती. 

 

यह अपराधी का अधिकार है की लेट फांसी होने से पहले वो इस सजा को अमान नीय घोषित करें. 

 

आर्टिकल 21(h) आपको विदेशो मे घूमने की अनुमति एवम अधिकार प्रदान करता है. आपको पूरी स्वतंत्रता है की अपनी इच्छा से किसी भी देश मे जा सकते है. 

यह आपको मौलिक अधिकार है. लेकिन तब ! ज़ब आप किसी क्राइम के केस मे ना फंसे हो. या आपको कोई छुआछूत की बीमारी ना हो जैसे कोरोना. 

 

आर्टिकल 21 (i) शोषण के विरुद्ध अधिकार. 

यह आर्टिकल हर भारतीय को यह अधिकार देता है की अगर कोई आपसे जबरदस्ती मज़दूरी करवाता है या फिर वो मजदूरी करवाने के पैसे नहीं देता तो आप उसके खिलाफ ये केस कर सकते हो की उसने आपका शोशण किया. 

 

इस आर्टिकल ने बंधुआ मजदूर जैसी चीज को खत्म करने का काम किया है. 

 

मान लो.. यदि आपको किसी ऑफिस मे चाय बनाने और सर्व करने के लिए रखा है और उसी का पैसा मिलता है तो ऐसे मे यदि अपने चाय बना कर सर्व कर दी है और आप free खड़े हो तो वहाँ आपको कोई यह बोले की आप ऐसा करो जा कर टॉयलेट की सफाई कर दो या कोई दूसरा काम कर दो. 

 

तो ये गलत है. हाँ आप अपनी इच्छा से ग़र करें तो बात अलग है वरना वो आपको फ़ोर्स नहीं कर सकता. या फिर उसके अलग से पैसे दें. 

 

यानी आपको शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाने का पूरा अधिकार है. और न्यायपालिका को तुरंत ऐसे केस पर सुनवाई करनी होगी. 

 

आर्टिकल 21(j) सार्जनिक रूप से जनता के बीच फांसी देने के खिलाफ अधिकार – Right to hanging against publicly 

 

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दोस्तों ये बात अक्सर आपने फिल्मो मे या जनता के बीच किसी  संगीन अपराध के होने पर जनता को गुस्से मे बोलते सुना ही होगा की इसे बीच चौराहे मे गोली मार दो, गर्दन काट दो या फांसी दे दो. 

 

तो हमारा संविधान ये करने की इजाजत नहीं देता. क़ानून द्वारा किसी भी अपराधी को फांसी, सिर्फ और सिर्फ निजी तौर पर दी जाएगी जनता के बीच नहीं. 

 

एक भारतीय, भले हो वो अपराधी हो और उसे फांसी की सजा सुनाई गई है फिर भी उसके पास इस बात का मौलिक अधिकार है की उसे जनता के बीच फांसी नहीं दी जा सकती. 

 

आर्टिकल 21(k) नींद का अधिकार -right to sleep

जी हाँ सुनने मे थोड़ा फनी है लेकिन यह अधिकार भी एक भारतीय को दिया गया है की आप ज़ब सोना चाहे सो सकते है. 

लेकिन इसका मतलब यह नहीं आप ऑफिस मे बैठे बैठे ज़ब मन किया सो गए. और पूछने पर यह कहने लग जाओ की भैया आर्टिकल 21 के तहत के मेरा मौलिक अधिकार है की मैं ज़ब चहुं सो सकता हूं. 

 

तो जनाब ये एथिकली गलत है आप  ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि आपको वहाँ पर काम करने की सैलरी दी जा रही है. सोने की नहीं. 

 

यदि आप ऑफिस time के बीच काम के समय  ऑफिस मे सोते हो तो आप कही ना कही अपने  बोस के मौलिक अधिकारों को वायलेट कर रहे हो. 

तो ध्यान रहे. 

 

आर्टिकल 21(l) ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ अधिकार – right to noise polution 

जी हाँ दोस्तों, यह आर्टिकल हर भारतीय को ये अधिकार देता है की कोई अगर noise polution फैला रहा है तो आप तुरंत उसकी शिकायत नज़दीकी पुलिस्टेशन मे कर सकते हो. 

 

लेकिन यहां पर ध्वनि प्रदूषण का पहले  सही मतलब समझ लो. 

 

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अभी ऐसा नहीं की आप बच्चो को टूशन पढ़ा रहे हो या योगा कर रहे हो या आप study कर रहे हो तो ऐसे मे कोई आपकी घर के पास से तेज़ बुलेट लें कर निकला तो आप उसकी शिकायत करने पहुंच जाओगे. 

 

जी नहीं. कुछ खास परिस्थितियाँ और जगह. 

परिस्थितियाँ जैसे रात को किसी भी तरह की पार्टी के दौरान रात को 10 बजे के बाद आप DJ नहीं बजा सकते. 

 

यानी जिस ध्वनि से बहुत ज़ादा लोगो को तकलीफ हो रही हो तो आप उसके खिलाफ एक्शन लें सकते हो. 

 

रही बात जगह की तो hospitel जैसी जगहों के आस पास आप वाहन का होरन नहीं बजा सकते. यानी किसी भी प्रकार ध्वनि प्रदूषण नहीं कर सकते. 

 

आर्टिकल 21(m) बिजली का अधिकार -right to electricity 

इस आर्टिकल के तहत हर भारतीय बिजली की सेवा का लाभ उठाने का अधिकारी है. बाक़ी ये अभी तक हमारे देश का दुःर्भाग्य है जो अब तक हर भारतीय को बिजली नहीं पहुंच पाई है. आजादी को 70 साल हो चुके लेकिन अभी भी बिजली हर घर तक नहीं पहुंची. 

 

आर्टिकल 21(n)महिला को सम्मान का अधिकार – right to woman respect 

इस आर्टिकल के तहत हर भारतीय महिला सम्मान की हक़दार है. यानी कोई भी आदमी, कुसी भी औरत से ऊँची आवाज़ या बतमीज़ी से बात नहीं कर सकता. 

 

क्योंकि महिलाओ का यह मौलिक अधिकार है की आप उनसे बतमीज़ी से बात नहीं कर सकते. 

 

अब यहां पर इसका मतलब यह नहीं की महिलाए कुछ भी बोले कुछ भी करें. जी नहीं ऐसा महि है. 

 

पहले इस आर्टिकल का सही मतलब समझ लो. संविधान कहता है की महिलाओ को समाज मे सर उठा कर जीने का हक है क्योंकि ऐसा बहुत समय से चलता आरहा था की महिलाओ को दबाया जा रहा था.

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अतः महिलाओ से सम्मान से पेश आया जाए और महिलाए स्वतंत्र रूप से सर्जनकीक स्थानों पर अजा जा सकें. इस लिहाज़ से संविधान ने महिलाओ को यह मौलिक अधिकार दिया. 

 

अब यहां पर महिलाए इस अधिकार का गलत फायदा उठा कर अगर मर्दो से बेवजह तू तू मैं मैं करने लग जाए.. तो ऐसा नहीं चलेगा. 

 

तो दोस्तों यह थे भारतीय संविधान के अनुसार अनुच्छेद 21 के द्वारा भारतीय नागरिकों को दिये गए बेहद जरुरी मौलिक अधिकार

 

चलिए अब बढ़ते है अपने अगले मौलिक अधिकार की तरफ. 

 

अनुच्छेद 22- कुछ दशाओं में गिरफ़्तारी और निरोध में संरक्षण : 

आर्टिकल 22इस बात की पुष्टि करता है की भारतीय संविधान मे कुछ प्रावधान ऐसे भी बनाए गए है जिसमे अपराधियों को जिस बात की और जितने समय की सजा दी गई बस वहीं सजा कटेगा.

यानी ऐसा नहीं की सजा काटते समय अपराधी को जेल मे मारडाला. 

 

यानी उसकी जान की रक्षा कु जिम्मेदारी जेलर और तमाम पुलिस अधिकारियो की होती है. 

 

अगर किसी भी व्यक्ति को मनमाने ढंग से हिरासत में ले लिया गया हो , तो उसे तीन प्रकार की स्वतंत्रता प्रदान की गई है : 

( 1 ) हिरासत में लेने का कारण बताना होगा .

 ( 2 ) 24 घंटे के अंदर ( आने जाने के समय को छोड़कर ) उसे दंडाधिकारी के समक्ष पेश किया जाएगा .

 ( 3 ) उसे अपने पसंद के वकील से सलाह लेने का अधिकार होगा . 

 

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 तीसरा मौलिक अधिकार – अनुच्छेद 23 शोषण के विरुद्ध अधिकार – 

आर्टिकल 23 यह बताता है की भारत मे कोई भी इंसानों की खरीद बेच नहीं कर सकता. उदाहरण के तौर पर कई बार आपने news या फिल्मो मे देखा सुना होगा की बच्चो और लड़कियों की बाहर देश मे सप्लाई की जाती थीं. सप्लाई करने के कई मकसद होते थे. तो यहां पर इंसानों की तस्करी यानी उन्हें बेचा खरीदा जाता था. 

 

आर्टिकल 23 दूसरी बात कहता है की कोई आपसे सलेब्री यानी गुलामी नहीं करवा सकता. 

 

उदाहरण के तौर पर पहले जमाने ऐसा होता था की आपने किसी बड़े जमींदार से लोन लिया लेकिन आप दिये गए समय अनुसार लोन की धनराशि नहीं दे पाए और आगे भी देने मे असमर्थ हो तो ऐसे मे वो जमींदार आपको या फिर आपके किसी बेटे या बेटी को एक बंधुआ मजदूर के तौर पर अपने यहां काम करने के लिए रख लेते थे. और कहते थे की ज़ब तक पैसा नहीं देते तब ये यही पर काम करेगा,या करेगी  यहां पर इसे दो वक़्त की रोटी दे दी जाएगी. और यही मजदूरी करेगा. या करेगी. 

 

तो यह पहले हुआ करता था.. लेकिन आज की डेट मे ऐसा नहीं कर सकता कोई. भले ही आपने बैंक से लोन लिया हो या किसी से भी, वो आपसे गुलामी नहीं करवा सकता. 

 

यह तो रही लोन की बात. इसके इलावा भी वजह कोई भी हो, आप किसी से गुलामी नहीं करवा सकते ….. जैसे  की ब्लैक मेल के जिए या किसी भी तरीके से. यह आज की डेट मे कानूनन अपराधी है. 

 

अनुच्छेद 24 : बालकों के नियोजन का प्रतिषेध : 

इस अनुच्छेद के अनुसार 14 वर्ष से कम आयु वाले किसी बच्चे को कारखानों, खानों या अन्य किसी जोखिम भरे काम पर नियुक्त नहीं किया जा सकता है. 

 

जैसे की मुग़ल काल मे एक बलबन नाम का शासक हुआ करता था जिसने सजदा और पैबोष नाम का एक रूल निकाल दिया था. 

 

बलबन का कहना था की जो भी हमारे कोर्ट मे आए पहले हमको दंडवत प्रणाम करें और उसके बाद अगर मुझसे कुछ भी कहना है तो पहले मेरे पैरो को चूमे. (इसी को बोलते थे सजदा और  पैबोस)

 

लेकिन आज की डेट मे ऐसा नहीं है. 

 

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चलिए बढ़ते है अगले मौलिक अधिकार की तरह. 

 

4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार 

 

संविधान मे इस मौलिक अधिकार को लेकर आर्टिकल 25 से लेकर 28 तक बहुत विस्तार से बताया गया है. 

 

चलिए एक एक करके जानते है. 

 

अनुच्छेद 25 : अंत : करण की और धर्म को अबाध रूप से मानने , आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता : 

 

भारत मे कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म को मान सकता है और उसका प्रचार प्रसार कर सकता है .  

 

यह हर भारतीय को मौलिक अधिकार दिया गया है की वह स्वतंत्र रूप से किसी भी धर्म को अपना सकता है. यानी धर्म बदल सकता है. 

 

अनुच्छेद 26 : धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता : 

आर्टिकल 26 ये बताता है की आप भारत मे स्वतंत्र रूप से धार्मिक आयोजन कर सकते है. लेकिन नोन वायलेंस तरीके से. 

 

व्यक्ति को अपने धर्म के लिए संथाओं की स्थापना व पोषण करने , विधि – सम्मत सम्पत्ति के अर्जन , स्वामित्व व प्रशासन का अधिकार है . 

 

अनुच्छेद 27 : राज्य किसी भी व्यक्ति को ऐसे कर देने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है , जिसकी आय किसी विशेष धर्म अथवा धार्मिक संप्रदाय की उन्नति या पोषण में व्यय करने के लिए विशेष रूप से निश्चित कर दी गई है . 

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आर्टिकल 27 हर भारतीय को यह आजादी (अधिकार) देता है की वह स्वतंत्रता  रूप से जितनी चाहे उतनी धनराशी किसी भी धार्मिक संस्थान (मंदिर, गुरुद्वारा, मस्जिद) को दान कर सकता है. 

 

दूसरी बात इन दान किये पैसों पर कोई टैक्स भी नहीं लगाया जाएगा. टैक्स free होगा. 

 

अनुच्छेद 28 : राज्य विधि से पूर्णतः 

भारतीय संविधान का आर्टिकल 28 बोलता है की जो शिक्षा संस्थान (education institution) है, वहाँ पर आप पूजा पाठ से जुड़े प्रावधान कर सकते हो. 

 

जैसे आपने देखा होगा कई स्कूल कॉलेजो मे हवन या फिर गुरुग्रंथ साहिब का पाठ करवाया जाता है. 

 

पोषित किसी शिक्षा संस्था में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी . ऐसे शिक्षण संस्थान अपने विद्यार्थियों को किसी धार्मिक अनुष्ठान में भाग लेने या किसी धर्मोपदेश को बलात सुनने हेतु बाध्य नहीं कर सकते 

 

तो दोस्तों यह थे धर्म से जुड़े अधिकार. 

 

चलिए अब बढ़ते है अपने आर्टिकल की तरफ – 

 

मौलिक अधिक 5= यह मौलिक अधिकार अनुच्छेद 29 से 30 तक है. 

 

 अनुच्छेद 29- संस्कृति एवं शिक्षा संबंधित अधिकार : right for culture and education 

 

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(अल्पसंख्यक यानी मुसलमान) 

अल्पसंख्यक हितों का संरक्षण कोई अल्पसंख्यक वर्ग अपनी भाषा , लिपि और संस्कृति को सुरक्षित रख सकता है और केवल भाषा , जाति , धर्म और संस्कृति के आधार पर उसे किसी भी सरकारी शैक्षिक संस्था में प्रवेश से नहीं रोका जाएगा . 

 

अनुच्छेद 30 : शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार : 

 

कोई भी अल्पसंख्यक वर्ग अपनी पसंद की शैक्षणिक संस्था चला सकता है और सरकार उसे अनुदान देने में किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करेगी . 

 

संवैधानिक उपचारों का अधिकार : right to constitutional remedies.

‘ संवैधानिक उपचारों का अधिकार ‘ को डॉ . भीमराव अंबेडकर ने संविधान की आत्मा कहा है . 

 

किसी भी भारतीय के मौलिक अधिकारों का कोई हनन ना कर सकें तो इस लिहाज से भारतीय संविधान ने इस मौलिक अधिकार की रचना की गई. 

 

अनुच्छेद 32 : इसके तहत मौलिक अधिकारों (fundamental rights) को प्रवर्तित कराने के लिए समुचित कार्यवाहियों द्वारा उच्चतम न्यायालय में आवेदन करने का अधिकार प्रदान किया गया है .

 

कोई भी अगर आपके मौलिक अधिकारों को वायलेट करता है तो आप के पास यह अधिकार है की आप हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट मे इसकी अपील अथवा शिकायत कर सकते है. 

 

इसी प्रकार सुप्रीम कोर्ट के पास भी आर्टिकल 32 का मौलिक अधिकार है की वो आपके मौलिक अधिकारो (fundamental rights)की रक्षा करें. 

 

इसके बाद आर्टिकल 33 आता है जो की मौलिक अधिकारों के अंतर्गत तो नहीं आता लेकिन इसे भी समझना बहुत जरुरी है. 

 

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आर्टिकल 33 के अंतर्गत सांसद  अर्ध बलो, अर्ध सैनिक बलो और भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों (आर्मी and इंटेलिजेंस)  को यह अधिकार देती है की भारत मे ज़ब भी कोई बंदा किसी आतंकवाद को अंजाम देते हुए पकड़ा जाता है तो वो उस बन्दे के सारे मौलिक अधिकार तुरंत खत्म कर सकता है. 

 

तो दोस्तों यह थे हमारे वो  6 मौलिक अधिकार (fundamental rights) जिसकी वजह से आज हर भारतीय सम्मान से सर उठाकर स्वतंत्र रूप से जी सकता है. 

 

चलिए अब जान लेते है की सात आर्टिकल मे से आर्टिकल नंबर 6 – संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार की लिस्ट  से क्यों हटा दिया गया था. 

 

44वें संविधान संशोधन के तहत इस मौलिक अधिकार , को बाक़ी मौलिक अधिकारों (fundamental rights) की सूची से अलग कर दिया गया था. यानी सम्पत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं रहा. 

 

सम्पत्ति का अधिकार का अर्थ है की आपका अपनी सम्पत्ति पर मौलिक अधिकार है उस पर आपका ही मालिकाना हक है. इसे आपसे कोई नहीं छीन सकता. 

आप अपनी सम्पत्ति का जैसे उपयोग करना चाहे कर सकते है. 

सम्पत्ति धन, जमीन, घर, खेत जैसे कई रूप मे हो सकती है. 

 

तो फिर अब सवाल ये उठता है की ऐसा क्या हुआ था की इस अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से हटा दिया गया. 

 

दोस्तों कई बार ज़ब कुछ रुल्स and रेगुलेशन बनाए जाते है तब हम उन घटनाओं के बारे नहीं सोच पाते की वैसा होने पर बनाया गया रुल्स गलत साबित भी हो सकता है. 

 

तो कुछ गलतियां बाद मे घटित होने वाली परिस्थितियों पर निर्भर करता है. 

 

तो ऐसी ही एक परिस्थिति केरल मे 1974  मे घटित हो गई थीं. इस केस को केशवा नन्द vs सरकार   , नाम दिया गया था. 

 

आपको पता ही होगा की कई स्प्रिचुअल (धार्मिक) लीडर होते है जैसे, गुरु, बाबा, काज़ी साहब,.. आदि. हर धर्म के अलग अलग.  लीडर

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तो ऐसे ही एक हुआ करते थे केशवानंद भारती. केशवा नन्द भारती एक आश्रम चलाते थे. या ऐसा कह लो उनके पास आश्रम से जुड़ी बहुत सारी जमीन थीं. 

 

जहाँ पर वह धार्मिक आयोजन करवाया करते, सत्संग किया करते हवन किया करते थे. 

 

(1975,इंद्रागाँधी के राज़  मे भारत मे आपातकाल लगा था लेकिन केशवानंद वाली यह घटना एक साल पहले 1974 की है )

 

तो सन 1974 मे केरल सरकार का एक प्रोजेक्ट पास होता है. तो उस प्रोजेक्ट के अंतर्गत केशवानंद भारती की जमीन आजाती है. 

 

कहने का मतलब आप ऐसा मान लो की केरल सरकार को कोई प्रोजेक्ट बनाना था तो उसके अंतर्गत केशवानन्द भारती की जमीन आजाती है. 

 

ऐसे मे सरकारी अधिकारी केशवानंद के पास आते है और प्रार्थना करते हुए कहते है की हम लोक हित के लिए  एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट बना रहे है आप ये जमीन छोड़ दे, बदले मे हम आपको इसका मुआवज़ा दे देंगे. 

 

लेकिन केशवानंद भारती का कहना होता है की नहीं नहीं माफ करिये लेखों हम ऐसा नहीं कर सकते.. बात मुआवज़े की नहीं है. 

 

ये जमीन एक धार्मिक प्रयोजन से बहुत महत्त्वपूर्ण है. सदियों से चली आरही परम्परा इसी जगह के माध्यम से सम्पूर्ण किये गए है. 

 

इस तरह दोनों मे जमीनी मुद्दे को लेकर खूब देर तक बहस चली. 

आखिर मामला पंहुचा हाईकोर्ट मे. केरल सरकार इस मामले को हाईकोर्ट मे लेकर जाती है. 

 

यहां पर केरल हाईकोर्ट ! केरल सरकार के पक्ष मे फैसला सुना देता है. 

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तो अब फैसला, केशवानंद भारती के विरुद्ध मे  आजाता है. 

 

अब केशवानंद भारती ये मामला के पहुंचते जाते है सुप्रीम कोर्ट वहाँ पर इस केस को लेकर अपील दायर  करते है. 

 

लेकिन इस बार अपील के साथ साथ एक रिट की अपील भी कर देते है. साथ मे एक और जबरदस्त अपील करते हुए बोलते है की हमारे फंडामेंटल राइट्स को वायलेट किया गया है .. 

 

बस इतना ही कहने की देर थीं की सुप्रीम कोर्ट तुरंत हरकत मे आजाता है. 

 

यानी तब तक तो ठीक था, एक जेनुअन बात थीं,  ज़ब तक केशवानंद भारती जमीनी विवाद को लेकर केरल सरकार के खिलाफ अपील डालते है…… लेकिन जैसे ही बात मौलिक अधिकारों (fundamental rights ) को भंग करने की आती है उसी समय ये केस पूरे देश भर मे आग की तरह फ़ैल गया. 

 

और फैले भी क्यों ना… जो न्यायालय खुद मौलिक अधिकारों के रक्षा की बात करता है वहीं उसके अगेन्स्ट मे फैसला सुना दे तो खुद सोचो क्या होगा. 

 

तो अब सुप्रीम कोर्ट के सामने भी यह एक चेलेंज था की किया जाए. 

सुप्रीम कोर्ट इस केस की सुनवाई करती है. और ऐसा करते करते 1978 आजाता है. यानी 4 साल से ये केस चलता रहता है. 

 

अंत मे मौलिक अधिकारों को ध्यान मे रखते हुए सुप्रीम कोर्ट केशवा नन्द भारती के फेवर मे यह फैसला दे देता है. 

 

यानी इस बार फैसला केरल सरकार के अगेंस्ट मे आजाता है. 

आपकी बता दें की उस समय मे जूरी मेंबर वाला प्रावधान हुआ करता था. यानी उन समय मे ऐसे बारे केसो की जो फाइनल डिसीजन लेती थीं वो जूरी मेंबर लेती थीं. 

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अब जूरी मेंबर क्या है?  

दोस्तों जूरी मेंबर मतलब किसी बड़े केस फैसला देने और विचार करने के लिए एक कमेटी बैठाई जाती थीं.. इस कमेटी मे समाज के प्रितिष्ठित लोगो को शामिल किया जाता था. जैसे की रिटायर्ड जाजुरबेकर न्यायाधीश, कोई एक्टिविस्ट हो गया समाज का, और भी कई समझदार लोग इन सब को मिलाकर एक कमेटी तैयार की जाती थीं. 

 

फिर इसमें फैसला फोटिंग के थ्रू किया जाता था. 

(दोस्तों एक movie आई थीं अक्षय कुमार की रुस्तम. उसमे आपने देखा होगा की लास्ट मे जूरी मेंबर मिलकर फैसला सुनाती है.)

 

तो सेम ऐसा ही उस समय चला करता था. केशवानंद भारती के लिए भी सुप्रीम कोर्ट के द्वारा कमेटी बैठाई जाती है. इस केस मे 13 सदस्य होते है. तो ज़ब फाइनल डिसीजन को लेकर वोटिंग करि जाती है तब सात लोग वोट करते है केरल सरकार के पक्ष मे और 6 लोग वोट करते है केशवानंद भारती के पक्ष मे. 

 

यानी कहने का मतलब केशवानंद भारती मात्र एक वोट से ये केस हार जाते है. 

 

अब पूरे भारत मे खलबली ये मच  जाती है की हमारा न्यायालय ही मौलिक अधिकारों (fundamental rights) के रक्षा की बातें करता है और अब वहीं इसका उल्लंघन कर रही है. 

 

तो लोगो के इन सवालों का जवाब देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस मौलिक अधिकार को बदलने की बाते कही. 

 

तब सुप्रीम कोर्ट के द्वारा इस तरह की परिस्थितियों को देखते हुए की देश और लोक हित के आड़े आने वाले एक व्यक्ति के मौलिक अधिकार कानूनी रूप से अमाननीय है. 

 

जिसके चलते 44वें सविधान संशोधन के द्वारा संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारो (fundamental rights) की सूची से हटा कर इसे संविधान के अनुच्छेद 300 ( a ) के अन्तगर्त क़ानूनी अधिकार के रूप में रखा गया है

 

इसके बाद प्रोजेक्ट का काम शुरू हुआ और केशवा नन्द भारती को उस जमीन का मुआवज़ा दे दिया गया.

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चलिए अब जानते है की बदलते समय और परिस्थितियों के अनुसार मौलिक अधकारो मे कब और क्या क्या बदलाव (संशोधन) किये गए 

 

मौलिक अधिकार में संशोधन =amandment in fundamental rights

 

  1. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य ( 1976 ) के निर्णय से पूर्व दिए गए निर्णय में यह निर्धारित किया गया था कि संविधान के किसी भी भाग में संशोधन किया जा सकता है , जिसमें अनुच्छेद 368 और मूल अधिकार को शामिल किया गया था .

 

  1. सर्वोच्च न्यायालय ने गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्यवाद ( 1967 ) के निर्णय में अनुच्छेद 368 में निर्धारित प्रक्रिया के माध्यम से मूल अधिकारों में संशोधन पर रोक लगा दी . यानी कि संसद मूल अधिकारों (fundamental rights) में संशोधन नहीं कर सकती है . 

 

3.24 वें संविधान संशोधन ( 1971 ) द्वारा अनुच्छेद 13 और 368 में संशोधन किया गया तथा यह निर्धारित किया गया की अनुच्छेद 368 में दी गई प्रक्रिया द्वारा मूल अधिकारों (fundamental rights) में संशोधन किया जा सकता है . 

 

  1. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्यवाद के निर्णय में इस प्रकार के संशोधन को विधि मान्यता प्रदान की गई यानी कि गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य के निर्णय को निरस्त कर दिया गया . 

 

  1. 42 वें संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद 368 में खंड 4 और 5 जोड़े गए तथा यह व्यवस्था की गई कि इस प्रकार किए गए संशोधन को किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जा सकता है . 

 

  1. मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ ( 1980 ) के निर्णय के द्वारा यह निर्धारित किया गया कि संविधान के आधारभूत लक्षणों की रक्षा करने का अधिकार न्यायालय को है और न्यायालय इस आधार पर किसी भी संशोधन का पुनरावलोकन कर सकता है . इसके द्वार 42 वें संविधान संशोधन द्वारा की गई व्यवस्था को भी समाप्त कर दिया.

 

तो दोस्तों यह थे हमारे मौलिक अधिकार और उनमे होने वाले बदलाव. 

 

उम्मीद करता हूं इस पोस्ट की मदद से आज आप आपने मौलिक अधिकारों को समझ गए होंगे. Fundamental rights.

 

दोस्तों मैं चाहता हूं की यह पोस्ट हर भारतीय तक पहुचे ताकी हर भारतीय अपने मौलिक अधिकार (fundamental rights) को जान और समझ सकें. 

 

उसके साथ कोई अन्याय ना कर सकें. वह अपने हक के खिलाफ आवाज़ उठा सकें. 

 

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