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Sushant singh rajpoot vs Bollywood nepotism

Sushant singh rajpoot vs Bollywood nepotism– नमस्कार दोस्तों,  चलिए जानते है ki आखिर किन परिस्थितिओं के चलते सुशांत (sushant singh) इतना डिप्रेशन मे आगए थे की उन्हें ऐसा करना पड़ा 

 

Sushant singh rajpoot vs Bollywood nepotism

 

 

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Nepotisam

 

 

अक्सर ज़ब भी राजनीती शब्द का ज़िक्र होता है तो मन के अंदर अपने आप ही, सर पर लम्बी टोपी तथा तन पर सफ़ेद कुर्ता पेजमा पहने,

कुछ महापुरुष की तस्वीरें उकरने लगती है.

लेकिन हकीकत मे तो यह सिर्फ नाम के लिए ही बदनाम है,

Sushant singh rajpoot

 

 

जबकि पॉलिटिक्स की सबसे तेज़ आंधी चलती है मायानगरी मुंबई मे,

 

जहाँ फ़िल्म इंडस्ट्री नाम का एक राक्षस धीरे धीरे मजबूर लोगो के सपने, और आखिर मे उनकी जिंदगी, को बूँद बूँद करके चूस लेता है..

 

Video देखो 👉🙏🎧

 

 

 

जी हा दोस्तों हम बात कर रहे सुशांत सिंह राजपूत की,

जो की बॉलीवुड मे कुछ घटिया लोगो के नेपोटिजम के चलते डिप्रेशन का शिकार हुआ और हमेशा के लिए इस दुनिया को अलविदा कह गया..

 

सुशांत सिंह अपनी काबिलियत के दम पर बहुत बेहतर कलाकार बन गए थे

Sushant singh rajpoot

वह बिना किसी की सपोट के अपने टेलेंट और मेहनत के दम पर फ़िल्म इंडस्ट्री के मशहूर सर नेम वाले एक्टर के साथ कंधे से कन्धा मिला कर खड़े होने लगे थे..

 

और यही बात bollywood के कुछ नेपोटिजम वालो के गले से नहीं उतर रही थीं..

 

जिसके चलते सुशांत( Sushant singh rajpoot)    के साथ फ़िल्म इंडस्ट्री मे कैसा व्यवहार होता था ये तो आपको अभी आगे बताएंगे..

 

लेकिन इन सब का नतीजा ये हुआ की सुशांत आपने डूबते करियर को लेकर इतने डिप्रेशन मे आगए की मौत को गले लगा बैठे..

 

और आज वो हमारे बीच नहीं है… 😞

तो चलिए आज पूरा खुलासा करते है की फ़िल्म इंडस्ट्रि के अंदर, अपने टेलेंट और मेहनत के दम पर किसी उभरते कलाकार के साथ होता क्या है.. कितनी कद्र है यहाँ टेलेंट की…?

Sushant singh rajpoot

 

 

*आज इस  आर्टिकल मे  ज़ब आपको सच्चाई का पता चलेगा तो आपके अंदर क्रोध की अग्नि भड़क उठेगी, और आप खुद बोलोगे की कितने बेशर्म है ये लोग…..*

 

तो चलिए शुरू करते है….

दोस्तों दिल पर पत्थर रख कर आज मे बता दू की bollywood के नेपोटिजम का शिकार होने वाले सुशांत सिंह राजपूत ऐसे कोई पहले इंसान तो नहीं थे और ना ही आख़री होंगे..

Sushant singh rajpoot

 

ऐसा ही चलता रहा तो आगे भी ऐसी घटनाए होती रहेंगी.

क्योंकि इसके कई कारण है. जिसे शब्दों मे उतारना बहुत मुश्किल है..

*लेकिन कुछ बातें है,*

जो घटियापन्ति की सारी सीमाएं लाँघ चुकी है और इस करतूत के पीछे बैठे हुए लोगो की खाल खींचना बहुत जरुरी हो गया है.

 

अब वक़्त आगया है की कुछ लोगो के चेहरे के ऊपर से नकाब हटाया जाए . और उनको आयना दिखाया जाए..

 

बाहर से हीरे की तरह दिखने वाली ये फ़िल्म इंडस्ट्री अंदर से कीचड़ से भरा हुआ एक दलदल है

 

जो मासूम लोगो को अपनी तरफ खीच कर खुद उनको अपनी जान जा दुश्मन बना देते है..

 

*सबसे पहला कारण है नेपोटिजम*

जिसमे हमारे देश की सिनेमा की ज़मीन को खोखला कर दिया है

और टेलेंट से भरे हुए एक्टर्स के मुँह पर तमाचा मार कर, उनको उस कामयाबी से दूर कर दिया है जिसके लिए वो सालों साल फ़िल्म इंडस्ट्री की दहलीज और दुनिया मे एड़ियां घिसाते रहते है..

 

Sushant singh rajpoot

 

जरा सोच कर देखिये आप पढ़ाई मे बहुत तेज़ है और कंधे पर किताबों से भरा हुआ एक बैग लेकर पूरे साल स्कूल जाते हो..

 

लेकिन एग्जाम के time पर टीचर जानबूझ कर आपको बिना पेपर दिए ही वापिस घर भेज दे और अपने खुद के बेटे को एग्जाम मे बिना कुछ लिखें ही क्लास मे सबसे ज़ादा नंबर बाट दे..

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*तब आपको कैसा लगेगा*?

तो दोस्तों ठीक ऐसा ही फ़िल्म इंडस्ट्री मे होता है… जिसमे एक तरफ फ़िल्मी सितारों बड़े बड़े प्रोडूसर्स के बेटे बेटियों को नई नई फिल्मे थाली मे सजा कर परोस दी जाती है.

 

तो वहीं दूसरी तरफ अपने टेलेंट के दम पर फ़िल्मइंडस्ट्री के बाहर से आए लोगो को ऑडिशन तक देने का ही मौका नहीं मिलता.

 

यहाँ पर टेलेंट कौड़ी के भाव बिकता जिसकी कोई कद्र नहीं करता…

 

फ़िल्म इंडस्ट्री मे कौन रहेगा कौन नहीं.. रातो रात किसे स्टार बनाना है और किसे बाहर का रास्ता दिखाना है..

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ये सारा खेल फ़िल्म इंडस्ट्री मे बैठे नेपोटिजम वालों के इशारो पर होता है…

 

नेपोटिजम के इसी घटिया खेल मे ना जाने कितने लोगो का करियर बर्बाद हो जाता है.

 

लेकिन इनको घंटा फर्क नहीं पड़ता इनको तो सिर्फ पैसे से मतलब होता है..

 

जो इसके खिलाफ आवाज़ उठाते है उनको या तो पागल घोषित कर दिया जाता है. या फिर काला जादू का इलज़ाम लगा देते है.

 

*फ़िल्म इंडस्ट्री का नेपोटिजम नंबर-2*

दूसरा कारण है, डुअल नेचर यानी दोगला पांति.

कुछ मशहूर प्रोडूसर है जिनके जेब काफ़ी मोटी है or अक्ल उससे भी ज़ादा मोटी हो चुकी है.

 

ये खुद को अपनी दुनिया के राजा समझते है बाक़ी सब छोटे मिटे कलाकार इनके लिए कीड़े मकौड़ो की तरह है.

 

आयुष्मान खुराना ने अपनी बुक मे एक किस्से का जिक्र किया है..

ज़ब स्ट्रगल वाले दिनों मे उनको करण जौहर के ऑफिस का नम्बर देकर उनको बोला गया था की आपका करियर सेट हो चुका है.

 

अगले दिन फोन किया तो जवाब मिला की नंबर गलत है..

 

दूसरी बार मिलाया तो सेक्रेटरी ने call.रिसीव करते हुए बोला की प्रोडूसर साहब अभी बीजी है बाद मे बात करना..

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उसके बाद तीसरी बार जवाब मिला की हम सिर्फ स्टार्स के साथ काम करते है.

लेकिन जब आयुष्मान मेहनत के दम पर फ़िल्मी दुनिया का मशहूर नाम बन गए तो करण साहब ने खुद उनको शो पर बुला कर फ़िल्म का ऑफर दिया.

 

जिसको आयुष्मान ने हस्ते हस्ते मना कर दिया..

अब इसका कारण तो आप समझ ही गए होंगे.

मतलब ज़ब तक आपके नाम के साथ फ़िल्म को जोड़ कर फायदा नहीं होगा तो प्रोडूसर साहब आपको चाय पर बैठने वाली मक्खी की तरह निकाल कर बाहर फेंक देंगे..

 

हा लेकिन आपका नाम अगर बिकता है यानी की एक ब्रैंड बन चुका है लोगो के दिलो मे छा चुका है तो वो उसी मक्खी के साथ चाय पीने को तैयार हो जाएंगे….

 

यानी की आपको लेकर फिल्मे बनाना शुरू कर देंगे..

*फ़िल्म इंडस्ट्री का नेपोटिजम नंबर-3*

तीसरा कारण है हमारे देश की नौका डुबाने वाली मिडिया.

जो आज कल खबरें दिखाती कम और बनाती ज़ादा है.

 

कौन स्टार आज बीमार है, कौन से स्टार का आज जन्मदिन है, कौन सा स्टार जिम मे पसीना बहा रहा है,

 

किसके बच्चे ने आज मुँह से पहला शब्द बोला.. और भी ना जाने क्या क्या बकवास …. बस यही सब इनकी खबरों की हेडलाइन होती है..

 

लेकिन एक चीज गौर की है, की खबरों मे दिखते वहीं है, जिनके नाम के पीछे कपूर या खान होता है,
बाक़ी बाजपेई, सद्दिक़ी, हुड़्डा, जैसे सर नेम वालो से इनको कोई लेना देना नहीं होता…

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अब आप क्या सोच रहे हो की मिडिया ऐसा क्यों करती है..

इसका सिम्पल सा जवाब है वो है हरे नोट जिससे इनका धंधा चलता है, एक्स्ट्रा इनकम आती रहती है.

 

जिसके बदले ये लोग जर्नलिजम की आड़ मे प्रमोशन की दुकान चलाते है. और कुछ मामूली तथा घटिया से टेलेंट वाले एक्टर को लोगो के बीच मे भगवान बना देते है.

 

 

*फ़िल्म इंडस्ट्री का नेपोटिजम नंबर-4*

चौथा कारण है चमचागिरी जिसके सहारे फिल्मो मे एंट्री करने के नए नए रास्ते तलाशने की कोशिश की जाती है.

 

फर्क बस इतना है की आप अगर किसी एक्टर के बेटे है तो आपको इज़्ज़त के साथ ऑफिस मे बैठा कर कहानी सुनाई जाती है.

 

लेकिन अगर आप बाहर वाले है और फिल्मो मे काम करना है तो पहले बंद कमरे के अंदर आपको इशारो पर नचाया जाएगा, जिसमे शरीर और दिमाग़ दोनों को नोच लिया जाता है.

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फिर भी अगर आप आवाज़ उठाने की हिम्मत करते हो और गलत को पूरी दुनिया के सामने लें कर आते है.

 

तो यही नेपोटिजम वाले फ़िल्मी दुनिया से आपका करियर हमेशा हमेशा के लिए खत्म कर देंगे और बाहर का रास्ता दिखा देंगे..

 

 

 

*फ़िल्म इंडस्ट्री का नेपोटिजम नंबर 5*

*नेपोटिजम का पाँचवा रूप यानी पाँचवा कारण है फ़िल्मी जगत के अवार्ड फंक्शन…*

 

 

फ़िल्म इंडस्ट्री मे अवार्ड को एक्टर की सफलता को मापने का हथियार माना जाता है …

लेकिन हक़ीक़त मे ये किसी धंधे से कम नहीं है, *तो चलिए जानते है की ऐसा क्यों?*

इस पूरे प्रोसेस को आपको आसान भाषा मे समझाता हु..

देखिये अवार्ड शो कराने वाला एक सुपोन्सर होता है.. जो अपनी फ़िल्म से जुड़े हुए लोगो को मुफ्त मे अवार्ड बाटते है..

अवार्ड फंक्शन मे बैठे जज भी वही होते है जो उस फ़िल्म के साथ जुड़े होते है…

 

यानी की फिल्मफेर यदि amazon ने करवाया तो गली boyes को 13 अवार्ड मिल गए सीक्रेट आप जानते ही है.

 

दूसरी कलाकारी है अपने मन से बनावटी कलाकार kids के हाथो मे चमचमाती ट्राफी पकड़ाना.

 

जिसके साथ सेल्फी खींच कर ये instagram पर अपलोड कर देंगे, क्योंकि बच्चे नाराज़ हो गए तो कल को फिल्मो मे काम कौन करेगा..

 

अब ज़रा इनसे पूछिए की सुशांत ने MS धोनी बन कर परदे पर जो कारनामा दिखाया था तो उसके बदले मे क्या ms धोनी को एक अवार्ड नहीं दिया जा सकता था…?

 

अगर जवाब ना है तो फिर डिक्शनरी से अवार्ड नाम का शब्द हमेशा हमेशा के लिए मिटा देना चाहिए.

 

 

*फ़िल्म इंडस्ट्री का नेपोटिजम नंबर 6 *उधार वाली इज्जत*

 

जिसके बिना मुंबई मे फिल्मो मे काम करना तो छोड़िये कोई आपकी तरफ मुड़ कर भी नहीं देखेगा..

 

अगर फिल्मो मे काम करना है तो आपके पास अच्छा खासा बांग्ला होना चाहिए, प्रोडूसर से मिलने जाओ तो चमचमाती लग्जरी कार से उतरना पड़ेगा.

 

और हा पार्टी करने शहर के सबसे महंगे क्लब मे नहीं गए तो आप फ़िल्म लाइन के काबिल ही नहीं है..

अब आप खुद समझ जाओ की कितना सड़ा हुआ कल्चर होता फ़िल्म इंडस्ट्री मे..

 

ये सब दिखावे वाला खेल अब कहीं ना कहीं एक्टर्स की जरुरत बन चुका है. जिसके बिना आपको पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाएगा..

 

पैसे नहीं है तो उधार मांगिये या बैंक से लोन लीजिये हा लेकिन पैसे वापिस चुकाने के लिए आपको फ़िल्म इडस्ट्री मे काम मिलेगा या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं है..

 

 

*फ़िल्म इंडस्ट्री का नेपोटिजम नंबर 7*

शो कॉल A list tv shose जो कहने के लिए तो सिर्फ एंटरटेनमेंट के लिए बनाए जाते है लेकिन हक़ीक़त मे इनका इस्तेमाल आपने अंदर छुपी हुई भड़ास निकालने के लिए किया जाता है..

 

कॉफी के बहाने आपसे पूछ लिया जाएगा की फलाना एक्टर तुमसे बेकार क्यों है वो पार्टी मे गरीबो जैसे कपड़े क्यों पहनते है या फिर वो किस तरह इंग्लिश बोलने मे अटकता है उस पर मजेदार चुटकले बनाए जाते है.

 

अब कमाल की बात ये है की इन shos का मकसद एंटरटेनमेंट बिलकुल नहीं है..

 

बल्कि यह अपने चुनिंदा दोस्त या फिर उनके बच्चों को पॉपुलर बनाने का एक शॉटकट तरीका है.

 

जिसमे एक एक्टर को नीचा दिखा के दूसरे को बेहतर साबित किया जाता है..

 

 

*फ़िल्म इंडस्ट्री का नेपोटिजम नंबर-8*

स्टार kids vs आउटसाइडर वाली जंग, जिसमे अक्सर छोटे शहर से बाहर आए लोगो को दरवाज़े पर लगी दीमक की तरह देखा जाता है,

 

अब ऐसे मे बाहर से आए इन लोगो के साथ फिल्मे तो छोड़िये इनसे हाय helo करना भी खुद की बेजती समझते है..

 

सोचिये ज़ब रवीना टंडन जैसी पॉपुलर एक्टर खुल कर इस बात का जिक्र करें की किस तरह अजीबो गरीब नामो से बुला कर उनका मज़ाक उड़ाया जाता था..

 

सिर्फ यही नहीं, बीच मे ही इनको किसी भी फ़िल्म से निकाल दिया जाना या फिर झूठ खबर चलाकर उनकी पर्सनल इमेज खराब करना… जैसी घटनाए होती रहती थी ..

 

तो फिर खुद सोचो छोटे एक्टर्स के साथ कैसा व्यवहार होता होगा..

यहाँ पर आउटसाइडर्स को एक खिलौने के तरह समझा जाता है जिसमे आसमान के सपने दिखाए जाते और फिर कम पैसे मे फिल्मे करवा के अपना काम निकलवा लिया जाता है..

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उसके बाद उनका फोन उठाना बंद कर दिया जाता है.. ऑफिस मे no एंट्री का बोर्ड लगा देंगे फिर ये ट्वीट करके पूछते है की आखिर ये डिप्रेशन हुआ कैसे.?

 

एक बार बताया तो होता..

अरे गरीब कलाकारों का मांस नोचने वालो भेड़ियों, थोड़ी तो शर्म करो.. इंसानियत के खातिर मुँह बंद कर लो…

 

*फ़िल्म इंडस्ट्री का नेपोटिजम नंबर-9*

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एक्टर का फ़िल्मी करियर यानी भविष्य..

एक सवाल जो हर उस एक्टर को अंदर से नोचता रहता है… की उसकी जिंदगी फिल्मो से कमाए हुए पेसो से टिकी हुई है ना की दादा परदादा की तिजोरी से..

 

अगर आपके नाम के पीछे मशहूर सर name नहीं लगा हुआ है तो हर दूसरी फ़िल्म मे आपको अपना टेलेंट साबित करना पड़ेगा. 

अगर एक भी फीमेल फ्लॉप हो गई तो आपके फ़िल्मी करियर मे full स्टॉप लग जाएगा tv के add मे एक सेकेण्ड तक का रोल भी नसीब नहीं होगा.

 

वहीं अगर आप कपूर और खान खानदान से है तो आप बिना हित फ़िल्म दिए फ्लॉप देते जाइये उसके बावजूद भी फ़िल्मी दुनिया मे आपका भविष्य सूरज की तरह चमकता रहेगा..

 

उम्मीद करता हु आप इस आर्टिकल / video से सब कुछ समझ गए होंगे की आखिर कैसे एक कलाकार नेपोटिजम के चलते डिप्रेशन का शिकार हो जाता है…

इस video or आर्टिकल को ज़ादा से ज़ादा शेयर कीजिये… 🙏🏻🙏🏻

 

कितने पापड़ बेलने पड़ते है फ़िल्मी दुनिया मे एक स्टार बनने के लिए फिर भी कोई गारंटी नहीं.. की स्टार बनेंगे या नहीं क्योंकि यह सब नेपोटिजम वाले डिसाइड करेंगे ना की आपकी काबिलियत और मेहनत..

 

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राममूर्ति नायडू | Rammurthy Naidu

 

 

 

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