chandrayaan-2 launch moon mission GSLV MK-3 ISRO

 

 

क्या है यह रोवर (प्रज्ञान)?

वजन- 27 किलो
मिशन की अवधि – 15 दिन (चंद्रमा का एक दिन)

प्रज्ञान नाम का रोवर लैंडर से अलग होकर 50 मीटर की दूरी तक चंद्रमा की सतह पर घूमकर तस्वीरें लेगा। चांद की मिट्टी का रासायनिक विश्लेषण करेगा। रोवर के लिए पावर की कोई दिक्कत न हो, इसके लिए इसे सोलर पावर उपकरणों से भी लैस किया गया है।

 

रोवर (प्रज्ञान)

 

 

 

 

chandrayaan-2- का वज़न और लागत 

कुल 3,850 किलोग्राम वजनी यह अंतरिक्ष यान ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर के साथ गया है। पहले चंद्र मिशन की सफलता के 11 साल बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने भू-स्थैतिक प्रक्षेपण यान जीएसएलवी-मार्क ।।। के जरिए 978 करोड़ रुपये की लागत से बने ‘चंद्रयान-2 का प्रक्षेपण किया है।

 

भारत ने चंद्रमा पर अपने दूसरे महत्वाकांक्षी मिशन चंद्रयान-2 का देश के सबसे वजनी 43.43 मीटर लंबे जीएसएलवी-एमके3 (GSLV MK-III) एम1 रॉकेट की मदद से सोमवार को सफल प्रक्षेपण कर इतिहास रच दिया।

 

chandrayaan-2
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कब पहुंचेगा चाँद  पर ? बाहुबली रॉकेट GSLV-MK3, chandrayaan-2, 

 

48 दिन में चांद पर पहुंचेगा हिंदुस्तान…
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) का दूसरा मून मिशन Chandrayaan-2 सफलतापूर्वक लॉन्च हो गया है. चंद्रयान-2 को 22 जुलाई को दोपहर 2.43 बजे देश के सबसे ताकतवर बाहुबली रॉकेट GSLV-MK3 से लॉन्च किया गया.

 

 

अब चांद के दक्षिणी ध्रुव तक पहुंचने के लिए चंद्रयान-2 की 48 दिन की यात्रा शुरू हो गई है. करीब 16.23 मिनट बाद चंद्रयान-2 पृथ्वी से करीब 182 किमी की ऊंचाई पर जीएसएलवी-एमके3 रॉकेट से अलग होकर पृथ्वी की कक्षा में चक्कर लगाना शुरू करेगा.

 

chandrayaan-2

कब पहुंचा था चंद्रयान-1 चाँद पर – कितने दिन लगे ?

इससे 11 साल पहले इसरो ने अपने पहले सफल चंद्र मिशन ‘चंद्रयान-1’ का प्रक्षेपण किया था जिसने चंद्रमा के 3,400 से अधिक चक्कर लगाए और यह 29 अगस्त, 2009 तक 312 दिन तक काम करता रहा। 

 

 

क्या है chandrayaan-2 का mission लक्ष्य ?

इसका मुख्य उद्देश्य चांद पर पानी की मात्रा का अध्ययन करना, चांद पर मौजूद खनिजों, रयासनों के बारे में पता करना, चांद के वातावरण का अध्ययन करना शामिल है। चंद्रयान-2 में कई प्रकार के कैमरे, रडार लगे हैं जिससे चांद के बारे में गहराई से अध्ययन हो सकेंगा।

 

chandrayaan-2

 

इसरो ने चंद्रयान-2 पर कहा है, ”हम वहां की चट्टानों को देख कर उनमें मैग्नीशियम, कैल्शियम और लोहे जैसे खनिज तत्वों को खोजने का प्रयास करेगें. इसके साथ ही वहां पानी होने के संकेतो की भी तलाश करेगें और चांद की बाहरी परत की भी जांच करेंगे। चाँद को लेकर दुनिया भर में खोज जारी है. चंद्रयान-1 जब 2008 में लॉन्च किया गया था तो उसने इस बात की पुष्टि की थी कि चाँद पर पानी है लेकिन चाँद की सतह पर नहीं उतर पाया था.

 

 

 

 

 

ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर क्या काम करेंगे?

 

चंद्रयान-2 भारत की चाँद की सतह पर उतरने की पहली कोशिश है. इससे पहले यह काम रूस, अमरीका और चीन कर चुका है. चार टन के इस अंतरिक्षयान में एक लूनर ऑर्बिटर है. इसके साथ ही एक लैंडर और एक रोवर है।

 

chandryan2

 

 

 

इस मिशन में लैंडर का नाम विक्रम दिया गया है और रोवर का नाम प्रज्ञान है. “विक्रम” भारत के अंतरिक्ष प्रोग्राम के पहले प्रमुख के नाम पर रखा गया है. डॉ.साराभाई भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक के रूप में जाने जाते थे; वे एक महान संस्था बिल्डर थे और विविध क्षेत्रों में बड़ी संख्या में संस्थानों को स्थापित या स्थापित करने के लिए मदद की।

 

 

 

 

क्या होता है लैंडर और रोवर ?

लैंडर वो है जिसके ज़रिए चंद्रयान पहुंचेगा और और रोवर का मतलब उस वाहन से है जो चाँद पर पहुंचने के बाद वहां की चीज़ों को समझेगा. मतलब लैंडर रोवर को लेकर पहुंचेगा.

 

चांद की कक्षा में पहुंचने के बाद ऑर्बिटर एक साल तक काम करेगा। इसका मुख्य उद्देश्य पृथ्वी और लैंडर के बीच कम्युनिकेशन करना है। ऑर्बिटर चांद की सतह का नक्शा तैयार करेगा, ताकि चांद के अस्तित्व और विकास का पता लगाया जा सके।

 

 

वहीं, लैंडर और रोवर चांद पर एक दिन (पृथ्वी के 14 दिन के बराबर) काम करेंगे। लैंडर यह जांचेगा कि चांद पर भूकंप आते हैं या नहीं। जबकि, रोवर चांद की सतह पर खनिज तत्वों की मौजूदगी का पता लगाएगा। चंद्रयान-2 के हिस्से ऑर्बिटर और लैंडर पृथ्वी से सीधे संपर्क करेंगे लेकिन रोवर सीधे संवाद नहीं कर पाएगा. ये 10 साल में चांद पर जाने वाला भारत का दूसरा मिशन है.

 

 

 

 

 

chandrayaan-2 lending के लिए दक्षिणी धुव्र क्यों चुना ?

भारत का चंद्रयान-2 चाँद के अपरिचित दक्षिणी ध्रुव पर सितंबर के पहले हफ़्ते में लैंड करेगा. वैज्ञानिकों का कहना है कि चाँद का यह इलाक़ा काफ़ी जटिल है. वैज्ञानिकों के अनुसार यहां पानी और जीवाश्म मिल सकते हैं.

 

मुंबई स्थित थिंक टैंक गेटवे हाउस में ‘स्पेस एंड ओशन स्टडीज’ प्रोग्राम के एक रिसर्चर चैतन्य गिरी ने वॉशिगंटन पोस्ट से कहा है, ”चाँद के दक्षिणी ध्रुव पर कोई अंतरिक्षयान पहली बार उतरेगा.

 

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कोई यह पूछ सकता है कि जोखिम होने पर भी चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास ही चंद्रयान क्यों उतरा जा रहा है और चांद में खोज के लिए जाने वाले मिशन के लिए ये ध्रुव महत्वपूर्ण क्यों बन गए हैं.

 

 

दरअसल, चंद्रमा का दक्षिणी धुव्र एक ऐसा क्षेत्र है जिसकी अभी तक जांच नहीं की गई. यहां कुछ नया मिलने की संभावना हैं. इस इलाके का अधिकतर हिस्सा छाया में रहता है और सूरज की किरणें न पड़ने से यहां बहुत ज़्यादा ठंड रहती है.

 

 

वैज्ञानिकों का अंदाज़ा है कि हमेशा छाया में रहने वाले इन क्षेत्रों में पानी और खनिज होने की संभावना हो सकती है. हाल में किए गए कुछ ऑर्बिट मिशन में भी इसकी पुष्टि हुई है.

 

 

पानी की मौजूदगी चांद के दक्षिणी धुव्र पर भविष्य में इंसान की उपस्थिति के लिए फायदेमंद हो सकती है. यहां की सतह की जांच ग्रह के निर्माण को और गहराई से समझने में भी मदद कर सकती है. साथ ही भविष्य के मिशनों के लिए संसाधन के रूप में इसके इस्तेमाल की क्षमता का पता चल सकता है।

 

 

chandrayaan-2 दुनियाभर की टिकी है निगाह इस मिशन पर

 
चंद्रयान-2 की सफलता पर भारत ही नहीं, पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं। चंद्रयान-1 ने दुनिया को बताया था कि चांद पर पानी है। अब उसी सफलता को आगे बढ़ाते हुए चंद्रयान-2 चांद पर पानी की मौजूदगी से जुड़े कई ठोस नतीजे देगा। अभियान से चांद की सतह का नक्शा तैयार करने में भी मदद मिलेगी, जो भविष्य में अन्य अभियानों के लिए सहायक होगा।

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चांद की मिट्टी में कौन-कौन से खनिज हैं और कितनी मात्रा में हैं, चंद्रयान-2 इससे जुड़े कई राज खोलेगा। उम्मीद यह भी है कि चांद के जिस हिस्से की पड़ताल का जिम्मा चंद्रयान-2 को मिला है, वह हमारी सौर व्यवस्था को समझने और पृथ्वी के विकासक्रम को जानने में भी मददगार हो सकता है।

 

 

 

चंद्रयान-2 -Chandrayaan-2 the moon mission

अर्थ से मून आर्बिट तक पहुंचने तक तीन देशों के खगोलशास्त्री रखेंगे नजर-

अमेरिका, रूस और चीन के बाद अंतरिक्ष में चौथी महाशक्ति के रूप में विकसित हुए भारत के चंद्रयान-2 प्रोजेक्ट पर देश-दुनिया की निगाह है। चंद्रमा की आर्बिट में पहुंचने तक यह बेहद संवेदनशील प्रक्रिया के अंतर्गत निगहबानी में रहेगा। तीन देशों में भारत के बनाए गए खास सिस्टम इस पर नजर रखेंगे। इसरो के वरिष्ठ वैज्ञानिक और चंद्रयान-2 प्रक्षेपण टीम का हिस्सा रहे बदायूं, उप्र निवासी सतपाल अरोरा से इस बारे में फोन पर बात हुई।

 

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उन्होंने बताया कि छह और सात सितंबर को चंद्रमा की आर्बिट में पहुंचने की प्रक्रिया के अंतर्गत चंद्रयान-2 की हर गतिविधि पर निगाह रखने की जिम्मेदारी वैसे तो इसरो पर ही है लेकिन इसरो की देखरेख में अमेरिका, रूस और चीन में बने भारतीय स्पेस सेंटर भी इस पर नजर रखेंगे।

 

अर्थ आर्बिट यानि पृथ्वी की कक्षा से मून की आर्बिट अर्थात चंद्रमा की कक्षा में पहुंचने पर चंद्रयान-2 की गति में परिवर्तन होंगे। इसको लेकर पूरी दुनिया के खगोल शास्त्रियों में काफी उत्साह है। वे चंद्रयान-2 की प्रत्येक गतिविधि को देखने के लिए अपने-अपने तरह से जुटे हुए हैं। चंद्रमा पर लैंडिंग करने के बाद चंद्रयान-2 का सक्रिय काल एक साल तय है। हालांकि यह अपनी मियाद से भी अधिक काम कर सकता है।

 

 

 

chandrayaan-2 कितना अलग है  chandrayaan-1 से ?

चंद्रयान-2 वास्तव में चंद्रयान-1 मिशन का ही नया संस्करण है। इसमें ऑर्बिटर, लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) शामिल हैं। चंद्रयान-1 में सिर्फ ऑर्बिटर था, जो चंद्रमा की कक्षा में घूमता था। चंद्रयान-2 के जरिए भारत पहली बार चांद की सतह पर लैंडर उतारेगा। यह लैंडिंग चांद के दक्षिणी ध्रुव पर होगी। इसके साथ ही भारत चांद के दक्षिणी ध्रुव पर यान उतारने वाला पहला देश बन जाएगा

 

 

 

GSLV Mk 3

 

 

 

इस बार चंद्रयान-2 का वजन 3,877 किलो है। यह चंद्रयान-1 मिशन (1380 किलो) से करीब तीन गुना ज्यादा है। लैंडर के अंदर मौजूद रोवर की रफ्तार 1 सेमी प्रति सेकंड है।चाँद को लेकर दुनिया भर में खोज जारी है. चंद्रयान-1 जब 2008 में लॉन्च किया गया था तो उसने इस बात की पुष्टि की थी कि चाँद पर पानी है लेकिन चाँद की सतह पर नहीं उतर पाया था. 

 

 

 

 

 

 

 

 

क्या था चंद्रयान-1और उसका मिशन-

जानिए chandrayaan-1 के बारे मे  जरूरी बाते क्या था chandrayaan-1 और उसका मिशन

चंद्रयान-1 (Chandrayaan-1) चंद्रमा पर जाने वाला भारत का पहला मिशन था. ये मिशन लगभग एक साल (अक्टूबर 2008 से सितंबर 2009 तक) था. चंद्रयान-1 को 22 अक्टूबर 2008 को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से अंतरिक्ष में भेजा गया था.

ये आठ नवंबर 2008 को चंद्रमा पर पहुंच गया था. इस चंद्रयान ने चंद्रमा की कक्षा में 312 दिन बिताए थे. तत्कालीन इसरो के चेयरमैन जी माधवन नायर ने चंद्रयान मिशन पर संतोष जताया था. चाँद को लेकर दुनिया भर में खोज जारी है. चंद्रयान-1 जब 2008 में लॉन्च किया गया था तो उसने इस बात की पुष्टि की थी कि चाँद पर पानी है लेकिन चाँद की सतह पर नहीं उतर पाया था. 

उन्होंने बताया था कि चंद्रयान को चंद्रमा के कक्ष में जाना था, कुछ मशीनरी स्थापित करनी थी. भारत का झंडा लगाना था और आंकड़े भेजने थे और चंद्रयान ने इसमें से सारे काम लगभग पूरे कर लिए हैं.

चंद्रयान-1 (Chandrayaan-1) की खोजों को आगे बढ़ाने के लिए चंद्रयान-2 को भेजा जा रहा है. चंद्रयान-1 (Chandrayaan-1) के खोजे गए पानी के अणुओं के साक्ष्यों के बाद आगे चांद की सतह पर, सतह के नीचे और बाहरी वातावरण में पानी के अणुओं के वितरण की सीमा का अध्ययन करने की ज़रूरत है.

भारत ने इससे पहले चंद्रयान-1 2008 में लॉन्च किया था. यह भी चाँद पर पानी की खोज में निकला था. भारत ने 1960 के दशक में अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू किया था और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एजेंडे में यह काफ़ी ऊपर है।

 

 

 

डॉ.विक्रम साराभाई- vikram sarabhai

dr vikram sarabhai

 

कौन

डॉ.साराभाई  (vikram sarabhai) भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक के रूप में जाने जाते थे; वे एक महान संस्था बिल्डर थे और विविध क्षेत्रों में बड़ी संख्या में संस्थानों को स्थापित या स्थापित करने के लिए मदद की। उन्होंने अहमदाबाद में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल) स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थीः

 

 

1947 में कैम्ब्रिज से स्वतंत्र भारत में लौटने के बाद, (vikram sarabhai) अहमदाबाद में अपने घर के पास परिवार और दोस्तों के द्वारा नियंत्रित चैरिटेबल ट्रस्ट को एक शोध संस्था को दान करने के लिए राजी किया ।

 

इस प्रकार, विक्रम साराभाई ने,(vikram sarabhai) 11 नवंबर, 1947 को अहमदाबाद में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल) की स्थापना की । उस समय वे केवल 28 वर्ष के थे। साराभाई (vikram sarabhai) निर्माता और संस्थाओं के जनक थे और पीआरएल इस दिशा में पहला कदम था। विक्रम साराभाई (vikram sarabhai) ने 1966-1971 तक पीआरएल में कार्य किया।

 

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के तहत भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की स्थापना उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक थी। (vikram sarabhai)भारत जैसे विकासशील देश के लिए रूस स्पुतनिक के सफलतापूर्वक प्रक्षेपण के बाद अंतरिक्ष कार्यक्रम के महत्व पर सरकार को राजी कर लिया। डॉ साराभाई (vikram sarabhai) अंतरिक्ष कार्यक्रम के महत्व पर यह वक्तव्य बल प्रदान करता है।

 

वे परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष भी थे। अन्य अहमदाबाद के उद्योगपतियों के साथ मिलकर उन्होंने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, अहमदाबाद के निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाई।

 

 

डॉ. साराभाई (vikram sarabhai) द्वारा स्थापित जाने माने कुछ संस्थान हैं:

भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल), अहमदाबाद

भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम), अहमदाबाद

कम्यूनिटी साइंस सेंटर, अहमदाबाद

कला प्रदर्शन के लिए दर्पण अकादमी, अहमदाबाद (अपनी पत्नी के साथ)

विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र, तिरुवनंतपुरम

अंतरिक्ष उपयोग केंद्र, अहमदाबाद (साराभाई द्वारा स्थापित छह संस्थानों/ केन्द्रों के विलय के बाद यह संस्था अस्तित्व में आई)

फास्टर ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (एफबीटीआर), कलपक्कम

परिवर्ती ऊर्जा साइक्लोट्रॉन परियोजना, कलकत्ता

भारतीय इलेक्ट्रॉनकी निगम लिमिटेड (ईसीआईएल), हैदराबाद

भारतीय यूरेनियम निगम लिमिटेड (यूसीआईएल), जादुगुडा, बिहार

 

 

Vikram Sarabhai Space Center (VSSC)  –साराभाई स्पेस सेंटर (VSSC) की पूरी जानकारी – hindi और english दोनों मे-

 

तिरुवनंतपुरम में विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (VSSC) इसरो का प्रमुख केंद्र है, जहाँ सैटेलाइट लॉन्च करने वाले वाहनों और साउंडिंग रॉकेटों की डिज़ाइन और विकास गतिविधियाँ की जाती हैं।

 

यह केंद्र प्रक्षेपण वाहन डिजाइन, प्रणोदक, ठोस प्रणोदन प्रौद्योगिकी, वायुगतिकी, एयरो संरचनात्मक और एयरो थर्मल पहलुओं, एवियोनिक्स, पॉलिमर और कंपोजिट, मार्गदर्शन, नियंत्रण और सिमुलेशन, कंप्यूटर और सूचना, मैकेनिकल इंजीनियरिंग जैसी अनुसंधान और विकास गतिविधियों के लिए काम करता है। , एयरोस्पेस तंत्र, वाहन एकीकरण और परीक्षण, अंतरिक्ष आयुध, रसायन और सामग्री।

(The center works for research and development activities such as launch vehicle design, propellant, solid propulsion technology, aerodynamics, aero structural and aero thermal aspects, avionics, polymers and composites, guidance, control and simulation, computer and information, platinum. , Aerospace systems, vehicle integration and testing, space armament, chemicals and materials.)

 

 

 

इंजीनियरिंग और संचालन के सभी पहलुओं की सिस्टम विश्वसनीयता और गुणवत्ता आश्वासन का अध्ययन और मूल्यांकन प्रत्येक क्षेत्र में आवश्यक पूर्णता के स्तर पर किया जाता है। कार्यक्रम की योजना और मूल्यांकन, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और औद्योगिक समन्वय, स्वदेशीकरण, मानव संसाधन विकास, सुरक्षा और कर्मियों और सामान्य प्रशासन समूह, इसकी सभी गतिविधियों के लिए केंद्र।

(System reliability and quality assurance of all aspects of engineering and operations are studied and evaluated at the level of completeness required in each area. Program planning and evaluation, technology transfer and industrial coordination, indigenization, human resource development, security and personnel and general administration group, the center for all its activities.)

 

 

 

 

साराभाई स्पेस सेंटर VSSC में अंतरिक्ष भौतिकी प्रयोगशाला वायुमंडलीय विज्ञान और अन्य संबंधित अंतरिक्ष विज्ञान गतिविधियों में अनुसंधान और अध्ययन करता है। केरल के अलुवा में अमोनियम पर्क्लोरेट प्रायोगिक संयंत्र (APEP) VSSC का एक हिस्सा है।

(The Space Physics Laboratory at Sarabhai Space Center VSSC conducts research and studies in atmospheric science and other related space science activities. The Ammonium Percolate Experimental Plant (APEP) in Aluva, Kerala is a part of the VSSC.)

 

 

 

प्रमुख कार्यक्रम- साराभाई स्पेस सेंटर (वीएसएससी) में पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी), जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (जीएसएलवी मार्क II और मार्क III), रोहिणी साउंडिंग रॉकेट, स्पेस-कैप्सूल रिकवरी एक्सपेरिमेंट, रियूसेबल लॉन्च व्हीकल और एयर ब्रीडिंग प्रोपल्शन के एडवांस व्हीकल प्रोजेक्ट्स शामिल हैं। पुन: प्रयोज्य लॉन्च वाहन.

(Major programs – Polar Satellite Launch Vehicle (PSLV), Geosynchronous Satellite Launch Vehicle (GSLV Mark II and Mark III), Rohini Sounding Rocket, Space-Capsule Recovery Experiment, Reusable Launch Vehicle and Advance of Air Breeding Propulsion at Sarabhai Space Center (VSSC) Vehicle projects are included. Reusable Launch Vehicle.)

 

 

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