best health tips -100 साल तक निरोगी रहने का रहस्य

best health tips– दोस्तों स्वागत है आपका स्वास्थ्य (health) से जुड़े रोचक तथ्यों की इस दुनियाँ मे | यहाँ पर आपको स्वास्थ्य से जुड़ी  महत्वपूर्ण जानकरियाँ उपलब्ध कारवाई जाती है जिससे आप अपने शरीर को रोगी होने से बचा सके अथवा एक निरोगी और खुशहाल जीवना जी सके | एक अच्छा स्वास्थ्य (health) ही जीवन जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति है | 

 

यहाँ पर आपको हजारो छोटी बड़ी health tips दी जाती है |

आज की हमारी healthtips  है की कैसे आयुर्वेद के नियम अनुसार जीवन जी कर हम अपने शरीर को 100 साल तक निरोगी रख सकते है |

 

 

best health tips –100 साल तक निरोगी रहने का रहस्य

 

आज से 3000 साल पहले आयुर्वेद के महान ज्ञानी महाऋषियों ने शरीर को 100 सालों तक स्वस्थ रखने के बहुत से नियम और सूत्र बनाए थे जिसका पालन आज के समय बहुत कम इंसान ही कर रहे है |

जो कोई भी उन महाऋषियों द्वारा बताए गए नियम ओर सूत्र के अनुसार अपनी लाइफ जी रहा है 80 की उम्र मे भी निरोगी है |

जबकि आज की प्रदूषित हवा पानी मे 80 साल तक निरोगी रहना तो दूर की बात है इस उम्र तक इंसान जिंदा रह जाए वही बहुत है |

best health tips -100 साल तक निरोगी रहने का रहस्य

इसलिए महर्षि वाघ बट्ट जी अपनी कितना अष्टांग हिरदयम मे भोजन को कब करना है. भोजन के साथ क्या खाना या पीना है और कौन सा भोजन कब करना चाहिए अथवा नहीं करना चाहिए इनसे जुड़े बहुत जरुरी नियम बताए गए है ताकी इन तीनो मे संतुलन बना रहे.

 

लेकिन आज के समय मे बहुत कम लोग ही वाघ बट्ट जी के बताए हुए सूत्र के अनुसार चलते है.

 

अधिकतर लोग  इन नियमो का पालन नहीं करते जिसका नतीजा यह होता है की इस नियम का पालन ना करने वाले लोग अक्सर बिमारियों से घिरे रहते इस लापरवाही के चलते  उनका वात पित्त और कफ का संतुलन बिगाड़ जाता है|

 

 

तो चलिये जानते है  महर्षि वाघ भट्ट जी  और महाऋषि चरक जी द्वारा बताए गए भोजन करने के अद्भुत और चमत्कारी लाभकारी नियम

 

  • भोजन मौसम के अनुकूल ही खाना पीना चाहिए | 
  • सूर्य अस्त होने के बाद यानि रात्री मे मे भोजन नहीं करना चाहिए |

 

इसका कारण यह है की जब तक सूर्य रहता है यानि सुबह से शाम तक के समय तक हमारी जठर अग्नि तीव्र रहती है जिससे खाया हुआ कुछ भी हजम हो जाता है |

(जठर अग्नि क्या होती है इसके बारे मे आपको निच्छे बता गया है )

सूर्य के अस्त होते ही जठर अग्नि भी मंद हो जाती है जिससे खाया हुआ भोजन हजम नहीं हो पाता और पेट मे ही सड़ने लगता है जो शरीर मे  पेट दर्द ,कब्ज ,जलन ,उल्टी आना ,छाती मे जलन ,सर दर्द गैस बनना आदि समस्याएँ पैदा करते हुए बदबूदार माल के रूप मे शरीर से बाहर निकल जाता है |

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इसीलिए यह भी कहा गया है जो लोग सूर्य अस्त होने के बाद यानि रात्री मे भोजन करते है तो इस समय बहुत हल्का और कम भोजन ही खाना चाहिए | 

 

जिसमे घड़ी के हिसाब से 7:30 से 8:50 तक का समय सबसे उत्तम माना गया है. इस समय के बींच भोजन खा लेना चाहिए.

रात्रि के समय शरीर मे वात्त बढ़ा हुआ रखता है इसलिए इसके विपरीत भोजन यानी ठंडी तासीर वाली चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए. जैसे कोई जूस, संतरा, लस्सी, खीरा दही टमाटर, आदि.

रात्री मे कभी ठंडी तासीर वाले खाद पदार्थ जैसे  दहि ,छाछ ,जूस ,टमाटर ,खीरा ,मूली ,संतरा ,घी मलाई  का सेवन नहीं करना चाहिए

रात्री मे यह चीजे कफ को बढ़ाती है जिसके शरीर मे अलग रूप से  दुष्परिणाम देखने को मिले है | जैसे सर्दी – जुकाम – ख़ासी – गला खराब आदि |

 

 

भोजन को 32 बार चबा कर ही निगलना चाहिए ताकि भोजन इतना बारीक हो जाए की अमाशय (जठर अग्नि) को भोजन पचाने मे बहुत मेहनत ना करनी पड़ी और जल्दी ही भोजन हज़म हो जाए.

 

भोजन उतना ही करे जितनी भूख हो.

भोजन  करते वक़्त जब डकार आजाए तो समझ जाए की आप सीमित भोजन भोजन कर चुके है | डकार आना एक ऐसी चेतावनी होती है जो यह बताता है की आपका लीवर 70% भोजन से भर चुका है अब और ना खाए क्योकि बाकी का 30% हिस्से मे तेजाबी अम्ल खाना पचाने के लिए भरा हुआ है अब ऐसे यदि और भोजन करते हो तो भोजन हजम नहीं होगा |

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ज़ादा बड़ा भोजन का टुकड़ा खाने वाले लोगो का भोजन उन लोगो के मुकाबले अधिक देरी से हजम होता है जो लोग भोजन के छोटे छोटे टुकड़े खाते है.

 

क्योकि ज़ब हम भोजन का बड़ा टुकड़ा खाते है तो ऐसे मे जल्दी जल्दी चबा कर निगल जाते है जिस वजह से जठर अग्नि को इस प्रकार के चबाए हुए भोजन को पचाने मे बहुत अधिक समय लगता है और एक समय ऐसा आता है की कई बार पाचक रस नहीं बन पाता क्यों की वह भी सिमित अवस्था मे बनता है.

तो ऐसे मे कई बार भोजन हजम नहीं होता.

 

 

सिर्फ भोजन के पचने से ही नहीं बल्कि शरीर की तीन प्रकृति वात्त पित्त और कफ का संतुलन बिगड़ जाने से भी हजारो रोग पैदा होते है |

 

 

महर्षि वाघ भट्ट जी अपनी पुस्तक अष्टांग हिरदयम मे कहते है की भोजन हमेशा सही समय पर और अपनी शरीर की प्रकृति अनुसार करना चाहिए .

 

शरीर मे वात्त पित्त कफ का सतुंलन बिगड़ जाने से हजारो प्रकार की छोटी बड़ी बीमारियाँ दस्तक देने लगती है |

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तो चलिये जानते है आखिर क्या है यह वात्त पित्त और कफ? इनका संतुलन बिगड़ जाने से शरीर कौन कौन सी बीमारियों से ग्रसित होने लगता है ?

 

शरीर मे वात्त, पित्त और कफ यह तीन प्रकृतियाँ पाई जाती है हर इंसान मे इन्हे तीन दोष के नाम से भी माना गया है क्योंकि जब इनका संतुलन बिगड़ता है तो शरीर बीमारियों से घिरने लगता है.

 

जरूर पढ़े- health tips शरीर की 300 बिमरियों की जड़-अपने शरीर की प्रकृति को समझने के लिए यानी वात्त-पित्त और कफ को अच्छे से समझने के लिए यहाँ clik करे …….

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तो चलिए विस्तार जानते है महर्षि वाघ बट्ट जी के द्वारा बताई गई शरीर की तीन प्रकृति .

 

जब हम सुबह उठते है तो हमारा कफ बढा हुआ होता है, इसलिए आयुर्वेद मे सुबह ऐसी चीजों को खाने के लिए कहा जाता है जो कफ बढ़ने से रोकती है एवम संतुलन बनाए रखती है. कफ दोष बढ़ने की वजह से शरीर मे 28 रोग पैदा होते है.

 

जिसमे सर्दी खासी जुकाम से लेकर सर दर्द, आलस, भूख ना लगना, त्वचा मे सफेदी आना, शरीर मे भारी पन आदि सभी रोग शामिल है.

 

इसलिए सुबह सुबह वासा युक्त आहार जैसे मांस, मक्खन, दूध, पनीर नहीं लेना चाहिए यह सब कफ को बढ़ाते है.

आयुर्वेद मे कफ दोष को शांत करने के लिए सबसे उत्तम चीज गुड़ बताई गई है. सुबह के भोजन के बाद गुड़ जरूर खाए.

 

इसके इलावा सोंठ, शहद, तुलसी भी कफ नाशक ओषधि है. best health tips -100 साल तक निरोगी रहने का रहस्य

 

 

चलिए अब बात करते है पित्त की.

 

आयुर्वेद के अनुसार दिन के समय हमारा पित्त बढा हुआ होता है इसलिए आयुर्वेद मे बढ़े हुए पित्त को शांत करने के लिए छाछ लस्सी पीना बहुत अच्छा उपाय है.

 

इसके इलावा पित्त शांत करने के लिए दिन के भोजन मे पकाते वक़्त या वाद मे अजवाइन जरूर डाले या फिर भोजन खाने के बाद आधा चम्मच अजवाइन और आधा चम्मच कालानमक खा कर आधा गिलास पानी पी लें.

 

इसके इलावा काला जीरा और गए का देसी घी भी पित्त नाशक है. शरीर मे पित्त बढ़ जाने से यदि समय पर पित्त को शांत ना किया जाए तो बढ़े हुए पित्त की वजह से 46 से 50 रोग शरीर मे पैदा होते है.

फ़ास्ट food और तले हुए भोजन का अधिक सेवन करने से पित्त तेजी से बढ़ता है.

 

अब आते है शान यानी रात्रि के भोजन की ओर.

 

आयुर्वेद मे बताया गया है की सूरज के अस्त होने के बाद भोजन नहीं करना चाहिए, सिराज के अस्त होने के हमारे पेट की जठर अग्नि बहुत शांत हो जाती है. इसलिए यह भी बताया गया है की रात्रि मे हल्का और कम भोजन ही खाना चाहिए..

 

जिसमे घड़ी के हिसाब से 7:30 से 8:50 तक का समय सबसे उत्तम माना गया है. इस समय के बींच भोजन खा लेना चाहिए.

रात्रि के समय शरीर मे वात्त बढ़ा हुआ रखता है इसलिए इसके विपरीत भोजन यानी ठंडी तासीर वाली चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए. जैसे कोई जूस, संतरा, लस्सी, खीरा दही टमाटर, आदि.

 

आयुर्वेद मे वात्त को वायु कहा गया है.
शरीर मे वात्त बढ़ने की वजह से 50 से ज्यादा रोग आते है. शरीर मे तेल की अच्छे से मालिश करना वात्त का नाश करने की सबसे उत्तम विधि है.

चलिये  अब जानते है महाऋषि वाघबट्ट जी ने पानी पीने के क्या नियम बताए है -पानी पीने के सही  नियम……..

 

जानने के लिए पेज नंबर 2 पर click करें 

 

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